Saturday, September 06, 2014

पुखताल गोम्पा : एक छुपी हुई , रहस्यात्मक दुनिया (भाग –दो ) Pukhtal Gompa


पहले भाग में पढ़ा कि :-
पदुम से कुछ दूर चलने के बाद खतरनाक रास्ता शुरू हो गया और मैं नींद के आगोश में समाता चला गया .............

इस लेख में नीरज और प्रकाश जी का उल्लेख बार-बार आएगा , अतः इनका परिचय देना आवश्यक है !
पात्र परिचय -
नीरज जाट - ये दिल्ली मेट्रो में 'जे.ई.' हैं और प्रसिद्द  ब्लॉग 'मुसाफिर हूँ यारों ' के लेखक हैं!
प्रकाश यादव - ये NSPL के आईटी हैड हैं ! बहुत अच्छे इंसान हैं!!
अब आगे .... 
दरअसल ‘पुखताल गोम्पा’ हमारी घूमने की लिस्ट में था ही नहीं इसकी योजना कैसे बनी ये आगे बताऊंगा I
 
अनमु पहुँचने से कुछ देर पहले मेरी आँख खुली I धूल का गुबार सा उड़ता दिखाई दे रहा थाI धूप में तेजी थी, भले ही वातावरण ठंडा थाI मन बैचेन सा हो गया
 
धूल से अटे हुए 15-15 किलो के बैग जब गाड़ी से उतार रहा था, तो मन में विचार आया,   'यार कहाँ फंस गया ?'

दरअसल ये ट्रेक ‘पदुम –दारचा ‘ ट्रेक कहलाता है अबकी बार मैं एक ‘ट्रेकर’ की हैसियत से नहीं, बल्कि फोटोग्राफी के हिसाब से गया था  और वहां मुझे मेरी उम्मीद से उलट पूरा माहौल मिला I हमने जोश में माहौल और परिस्थितियों को समझे बिना जरूरत से ज्यादा वजन ले लिया था
 
खैर बुझे मन से अपना बैग लाद कर चार–पांच घरों के गाँव ‘अनमु’ में उतरे और सडक के किनारे बने छोटे से तम्बुनुमा ढाबे में जाकर बैठ गएI मन में विचार चल रहा था कि , 90-95 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ेगी I साँस लेने में दिक्कत महसूस हो रही थी और ऊपर से 15 किलो का बैग लाद कर खतरनाक रास्ते पर चलना था I अंदर से दिल बैठा जा रहा था
15 किलो का बैग लाद कर इस खतरनाक रास्ते पर चलना था


इधर ‘नीरज’ नाम के प्राणी को भूख लगी हुई थी और वो ढाबे की मालकिन से खाने की पूछ रहा था , उधर मेरी भूख मर चुकी थी ढाबे की मालकिन ने चावल और मटर की सब्जी एक आदमी के खाने लायक होने की बात कही नीरज को उम्मीद जगी ही थी कि यहाँ भी वो विदेशी जोड़ा, उसके खाने पर ‘डाका’ डाल चुका था दरअसल ढाबे की मालकिन को विदेशियों से ज्यादा पैसे मिलते हैं,इसलिए उसने खाना उन विदेशियों को दे दिया और थोड़ी बहुत मटर की सब्जी बची थी, वो गिर गई नीरज का मूड ख़राब हो चुका था   

वहीं सीमा सडक संगठन के इंजिनियर साहब बैठे हुए थे उन्होंने पुछा , “ कहाँ से आये हो ?“
मैंने राउंड फिगर में दिल्ली बोल दिया I बात आगे बढ़ी तो वो नीरज के ‘पडोसी’ (गाँव या शहर ) के निकले और दोनों के ‘जाट’ की पुष्टि होते ही हाथ मिले I इंजिनियर साहब ने अपने यहाँ खाने का निमंत्रण दे दिया और नीरज ने सहर्ष स्वीकार किया     
  
चाय-वाय पीने के बाद हम BRO के ‘हट’ की ओर चल  दिए I इंजिनियर साब राजकुमार जी ने काफी अच्छी खातिरदारी की   
 
कुर्सी पर बैठे इंजिनियर साहब राजकुमार जी
 ‘अनमु’ से ट्रेक शुरू करते हुए लगभग दो बज चुके थे हवा में ठंडक थी पर धुप तेज और चमकीली थी जैसे ही पन्द्रह किलो का बैग पीठ पर डाला तो एक कंपकंपी सी आई मन में विचार आया कि , ‘बेटा और ट्रेक कर I’ 

 प्रकाश जी का यह पहला ट्रेक था और वे सीधे 4000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर ट्रेक कर रहे थे उनके बैग का वजन भी उतना ही था, जितना मेरा था मुझे उनको ले कर फिकर होने लगी थी I वो खच्चर किराये से करने की बोल रहे थे और मेरे मन में था कि इतना  वजन लाद के एक बार चल तो लें , खच्चर आगे कर लेंगे इसी उधेड़बुन में नीरज से एक ‘झड़प’ भी हो गई I आखिर हम अपना–अपना वजन ले कर चल पड़े कुछ मीटर चलने पर ही साँस फूलने लगी थी, दिमाग ऑक्सिजन के बिना सही निर्णय नहीं ले पा रहा था हालात बेहद मुश्किल थे मेरे और नीरज के बीच किसी बात को लेकर एक 'झडप' और हो गई और मैं वापसी के लिए मुड चुका था
 
 प्रकाश जी बोले, ‘यार तुम दोनों के चक्कर में मैं पिसुंगा I” मैंने भी सोचा ये बेचारे इतनी दूर आये हैं , तो इनक ट्यूर क्यों ख़राब करूँ I  हम चलते रहे , थोड़ी-थोड़ी देर में साँस फूल रही थी I नीरज सबसे ठीक चल रहा था I सीमा सडक संगठन द्वारा बनी हुई कच्ची सी सडक पीछे छूट चुकी थी I अब हम एक –डेढ़ फुट चौड़ी पगडण्डी पर थे, जो खड़े पहाड़ के साथ–साथ  थी और नीचे नदी बह रही थी I रास्ता कभी–कभी बड़ा डरावना हो जा रहा था I मन को ज्यादा सजग कर के चलना पड़ रहा था I डर था कि, चक्कर आ गए तो ? नीचे नदी का भयानक प्रवाह था I 
 
अब हम एक –डेढ़ फुट चौड़ी पगडण्डी पर थे
  एक जगह आकर नीरज ने मुझे अपनी ट्रेकिंग छड़ी दे दी I मैंने कोई प्रतिकार किये बिना छड़ी ले ली I हमारे बीच कोई मन-मुटाव होता है , वो क्षणिक होता है I छड़ी से सहारा मिल जा रहा था I प्रकाश जी के पास पहले से ही छड़ी थी I
 
दूर पत्थर पर एक आदमी खड़ा है , वही नीरज है
सबके कैमरे बगल में लटके हुए थे I ऑक्सिजन की कमी से साँस में दिक्कत और उलटी जैसा मन हो रहा था I सर दर्द कर रहा था I ऐसी परिस्थिति में ‘फोटोग्राफी’ करने की सूझती ही नहीं है I आखिर इन विपरीत परिस्थितियों में मेरे अन्दर का ‘फोटोग्राफर’ जागा और एक-दो शॉट लिए I कैमरे की बैटरी बचाने और कैमरे को धूल से बचाने का विचार भी मन में सतत चल रहा था I प्रकाश जी का सोलर चार्जर मेरे कैमरे की बैटरी के लिए बेकार था I फिर भी आगे चलते हुए ठीक –ठाक मात्रा में फोटो लिए I
 
हमारा उस दिन का लक्ष्य ‘पुरने’ गाँव था I हम सोच रहे थे की आज शाम तक पुरने पहुँच जायेंगे , लेकिन शाम (7 बजे ) ढलने लगी थी I अब अँधेरा हो चुका था और हम पुरने तो दूर, उससे पहले ‘चा ‘ गाँव तक भी नहीं पहुँच पाए थे I फिर निर्णय हुआ कि आज ‘चा’ में ही रुकेंगे I
 
अँधेरा और सुनसान जनविहीन पहाड़ के कगार पर रास्ता और सैकड़ों फुट नीचे बहती नदी रास्ते की भयानकता को बढा रही थी I नीरज ने मोबाइल को ‘हेड लाईट’ बना लिया था और प्रकाश जी का मोबाइल ‘हैण्ड लाईट’ का काम कर रहा था I  

 प्रकाश जी की गति बेहद धीमी हो चुकी थी I मुझे लगा, ये ट्रेक पूरा नहीं कर पाएंगे I जैसे-तैसे आगे बढ़ते हुए ‘चा’  गाँव की (सौर उर्जा से चलने वाली ) लाइटें दिखाई देने लगी थीI मन में उम्मीद जगी कि ,चलो आज रात का ठिकाना तो मिलेगा I
 
एक मोड पर नीरज गाँव की रात की फोटो ले रहा था I  मैं आगे था और मुझे गाँव में पहुँचने की जल्दी थी I आखिर गाँव में पहुँच कर टीन शेड से ढकी हुई किसी चीज पर हम  (मैं और नीरज ) बैठ गए I  14 अगस्त को पाकिस्तान आजाद हुआ था और 15 अगस्त को भारत , 13 अगस्त को नीरज कहता है कि ,’मैं इंडिपेंडेंट' होना चाहता हूँ I’ मैं बोला , ‘हो जा I

उसके लिए ‘इंडिपेंडेंट' का मतलब था कि, मैं अपनी गति से और मर्जी से मंजिल की ओर बढूँगा और मुझे कोई रोकेगा नहीं I 

 हम लद्दाख (जान्सकर वैली ) के एक ऐसे गाँव में हम रुकने वाले थे जो कि, बहुत रिमोट एरिया में था I यहाँ हम श्रीनगर से तीन दिन के सफर के बाद पहुंचे थे I रात के नौ बजे घर से बाहर निकली एक महिला को हमने पूछा , “रहने खाने के लिए मिल जायेगा क्या ? ´ वो बोली , ‘हो जायेगा I’ 
कितना लोगे ?
वो बोली , ‘पर हेड पांच सौ I
रहने और दो टाइम खाने के पांच सौ , हमने मान लिया I

हमसे बात करके महिला तो पता नहीं कहाँ चली गई; लेकिन एक आदमी नशे की सी हालत में वहीं बैठा हुआ था, वो हमें अपने घर ले गया

'चा' गाँव 
 एक लद्दाखी गाँव और उनके घरों में रुकने का ये जीवन का पहला मौका था I घर में घुसते ही कच्ची शराब की सी गंध आई I घर के  अन्दर वो एक कमरे में ले गया I कमरा ट्रेकर्स के रुकने के हिसाब से ही बनाया हुआ था और उसकी साज-सज्जा भी वैसी ही थी I 'कच्ची छत' को कपड़ा लगा कर सजाया गया था तथा नीचे फर्श बिछा कर सबके आगे छोटी –छोटी सेंटर टेबल लगी हुई थी I चार-पांच गद्दे  और उन पर कम्बल  पड़े हुए थे I मुझे पसीना सूखने के बाद बहुत तेज ठण्ड लगी I मैं एक कम्बल में घुस गया I खाना आया , लेकिन मेरा मन नहीं था, फिर सभी के आग्रह पर थोडा सा खा लिया I

 
 यहीं पर अगले दिन की योजना बनाई गई, जिसमें सामान यहीं छोड़ कर ‘पुखताल गोम्पा’ जाने और फिर वापसी में ‘पुरने’ में रुकने की योजना बनी  I   

सुबह आराम से उठे और नित्य-क्रिया से निवृत हुए , लेकिन पानी बहुत ठंडा होने की वजह से नहाये नहीं I मैंने और प्रकाश जी ने अपना सामान ‘पुरने’ पहुंचाने के लिए घोड़े वाले को तय कर वहीं छोड़ दिया पर नीरज अपने को आगे के ट्रेक के लिए ‘अनुकूलित’ करने के लिए सामान को पीठ पर लाद के चल पड़ा था I
 
पुखताल या फुकताल गोम्पा  ‘चा’ गाँव  से थोडा ऊपर की तरफ चल कर एक सपाट से पहाड़ पर से होते हुए जाना था I  मैं अब वजन से मुक्त था, तो फोटो खीचने का मन भी हो रहा था, हालांकि ‘हाई एलटीट्युड’  के कारण होने वाले लक्षण अभी भी परेशान कर रहे थे I नीरज बैग को लाद कर अपनी गति पकड़ चुका था, पर प्रकाश जी वजन के बिना भी अपनी ‘कल’ वाली गति से ही चल रहे थे I
 
रास्ते में एक लड़का मिला और उसने हमें सैल्यूट-सा किया I ये मुझे अजीब लगा , क्योंकि इधर लोग ‘जुले –जुले’ से अभिवादन करते हैं और मैं अन्दर से झुंझलाकर भी उसका जवाब देता था I उस लड़के को हम ‘लोकल’ समझ रहे थे , लेकिन वो भी एक ट्रेकर था और बंगाल से आया था I उसने बताया कि आगे रास्ता बहुत ही खतरनाक है I डेढ़ से दो  फीट चौड़ी पगडण्डी पर पत्थर सरककर आ गए थे और उसके  नीचे दो सौ मीटर की गहराई में नदी अपने पूरे प्रवाह से बह रही थी I

‘होगा जो देखा जायेगा’ की तर्ज पर हम आगे बढ़ लिए I धीरे-धीरे मैं गति पकड़ चुका था, प्रकाश जी अपनी गति से चले आ रहे थे और वो बेमन से पुखताल जा रहे थे I नीरज फोटोग्राफी करता हुआ चल रहा थाI प्रकृति के रंग पल–पल बदल रहे थे, पर शरीर साथ न दे तो प्रकृति के रंग भी बेरंग लगते हैं I प्रकाश जी के साथ यही हो रहा था और थोडा बहुत मेरे साथ भी I  

प्रकृति के रंग पल–पल बदल रहे थे
 कहीं हिमाच्छादित पर्वत तो कहीं एकदम सपाट पहाड़ जैसे भावना विहीन कोई व्यक्ति सदियों से खड़ा रहने के लिए अभिशप्त हो प्रकाश जी और प्रकाश जी को साथ लेकर चलने में नीरज पीछे छूट गए थे और प्रकाश जी के साथ नीरज के होने की वजह से मैं प्रकाश जी की तरफ से निश्चिन्त हो आगे बढा जा रहा था I पर मन में एक ख्याल ये भी आता था कि नीरज ने तो कल ही ‘इंडिपेंडेन्ट’ होने की घोषणा की थी फिर मन को समझाया कि प्रकाश जी भी कोई बेवक़ूफ़ नहीं है , आखिर एक बड़ी कंपनी के आईटी हैड हैं I
 
मैं अब अकेला चला जा रहा था रास्ते में एक जगह कुछ फूलों पर तितलियाँ उड़ती दिखाई दी, तो मैंने फोटो के उद्देश्य से कैमरा निकाल लिया, तभी मुझे पीछे किसी के होने का अहसास हुआ
 
बड़ा मुश्किल था फोटो खींचना और उड़ती हुई तितली .... और भी मुश्किल ।  
 मैंने गर्दन घुमा कर देखा तो एक सात-आठ साल का लद्दाखी बच्चा था I उसने मुझे ‘जुले-जुले’ से अभिवादन किया और मैंने ‘जुले –जुले’ से ही जवाब दे दिया मैंने बातचीत को आगे बढ़ने की गरज से पूछा की ‘पुखताल’ कितनी दूर है, तो उसने बताया अभी एक घंटा और लगेगा मैं समझ गया की ये उसकी गति बता रहा है, मेरे लिए वो दो घंटे से भी ज्यादा का सफर था यहाँ एक बात ध्यातव्य है , वो ये कि पहाड़ों में किलोमीटर से नहीं; समय से दूरी नापी जाती है

वो लड़का धीरे–धीरे मुझसे बहुत आगे निकल गया और फिर एक मोड पर मैंने गौर किया कि, वो रुक कर मुझे देख रहा है I मैं समझ गया कि , ये वो ही खतरनाक जगह है, जहाँ छोटा लैंड स्लाइड हुआ है और पत्थर रास्ते पर आकर रास्ते को कठिन बना चुके हैं उस लडके और मेरे बीच की दूरी लगभग एक किलोमीटर होगी मैंने पीछे मुड कर देखा तो तीन औरतें और आ रही थी और वो लड़का उन्ही के साथ का था प्रकाश जी और नीरज दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहे थे I मैंने सोचा थोडा रुक लूं लगभग आधे घंटे के इंतजार के बाद भी दोनों में से कोई नहीं दिखाई दिया तो, मैं फिर चल पड़ा चलते –चलते वो जगह भी आ ही गई , जो खतरनाक थी
 
मैंने नजदीक जा कर देखा, तो लगा कि पार किया जा सकता है और जैसे ही उन पत्थरों पर कदम रखा, वो नीचे सरकने लगे I मेरी टांगो में कम्पन होने लगा और नीचे का नजारा जैसे ही देखा, वो होश उड़ाने के लिए काफी था नीचे वास्तव में दो सौ मीटर की सीधी गहराई में नदी अपने उफान पर थी I वहां से सरकने का मतलब सीधे नीचे नदी में   फिर मन में ये विचार आया कि ,’अगर मैं यहाँ से सीधा नदी में गिरता हूँ तो किसी को पता भी नहीं चलेगा कि कहाँ गया?’ फिर मन को समझाया, ‘नीचे मत देख I‘ और सरकते पत्थरों पर जल्दी –जल्दी पैर रख कर पार का गया  

दाईं तरफ मेरा जूता दिखाई दे रहा है और  लगभग दो सौ मीटर नीचे नदी
 अभी मैं  इस डर से खुद को संयत कर पाता इतने में ‘हैलिकोप्टर’ की सी आवाज मेरे पीछे से आई और जैसे ही मैंने पीछे मुड कर देखा मैं सन्न रह गया जहाँ से अभी मैं गुजरा था, ठीक वहीं एक बड़ा सा पत्थर ऊपर से लुढ़कते हुए नीचे आ रहा था और अपने साथी पत्थरों को भी ‘हमराह’ बनाता जा रहा था मन में फिर सोचा , ‘हे भगवान कहाँ फंस गया ?’                 
प्रकाश जी और नीरज को भूल मैंने अपने कदम और तेज बढ़ाने शुरू कर दिए और तभी एक और पिछले वाले से मुश्किल लैंड स्लाइड वाला रास्ता आ गया I मैंने बेबसी में पीछे मुड कर देखा, तो दूर वो औरतें आती दिखाई दी I उनके साथ वाला बच्चा आगे जा कर गायब हो गया

  ये उनके लिए रोजमर्रा की बात होगी; पर मेरे लिए बेहद डरावना-सा अनुभव था I पीछे वापस जाने का मतलब वो खतरनाक रास्ता फिर पार करना पड़ता काफी देर तक असमंजस की स्थिति में वहीं खड़ा रहा लद्दाखी औरतें नजदीक आती जा रही थीं मैंने सोचा, ये भी तो रास्ता पार करेंगी और मैंने कांपते क़दमों से उन सरकते ढीले पत्थरों पर पैर रख ही दिए I मैंने अपना पूरा वजन पहाड़ की तरफ रखा हुआ था, न कि खाई की तरफ I हाथ की स्टिक को भी आगे मजबूती से गाड़-गाड़ कर कदम बढा  ही रहा था कि, पत्थरों ने सरकना शुरू कर दिया और मैं डर के मारे बैठ गया थोड़े से पत्थर सरकना बंद हुए और मैं उठ कर तेज कदमों से छलांग लगा कर पार हो गया I
 
रास्ता पार करने के बाद दिल और दिमाग धीरे- धीरे संयत होने लगे तो नीरज और प्रकाश जी का ख्याल आया नीरज की मुझे चिंता नहीं थी , पर प्रकाश जी के लिए तो मैं यही दुआ कर रहा था कि, वो लौट जाएँ   
पीछे दूर कहीं कई लोगों का ग्रुप आ रहा था I मैंने अपने को आश्वस्त किया कि, कोई बात नहीं उन लोगों के साथ प्रकाश जी और नीरज आ जायेंगे I अब मुझे प्यास महसूस होने लगी थी I पानी का कोई स्रोत दूर–दूर तक नहीं दिखाई दे रहा था I बोतल प्रकाश जी और नीरज के पास तो थी, पर मैं बेवकूफी कर गया मेरे पास ग्लूकोज का डब्बा था उसको चाटने या खाने से तो और प्यास बढती सोचा, ‘चलता रह एक-डेढ़ घंटे की प्यास से कोई मरता नहीं है Iमैं चलता रहा और दूर एक पाइप लाइन जाती दिखाई दी

दिमाग में ये ही ख्याल आया कि ; ये पुखताल गोम्पा के लिए पानी की सप्लाई लाइन है , जो किसी झरने से जोड़ी गई है उम्मीद और सूखे कंठ के साथ मैं आगे बढ़ता गया I अब रास्ता धीरे–धीरे नीचे की तरफ उतरने लगा था और दूर उतरकर एकदम नदी के साथ हो लिया I पानी पीने की उम्मीद तो जगी, लेकिन नदी का पानी बहुत मटमैला था I वो पानी नहीं पीया जा सकता था    

मैंने सोचा नदी के पास किसी खड्डे में कहीं साफ़ पानी मिल जायेगा और मैंने अनवरत चलना जारी रखा I अब मैं ऊंचाई से उतरकर नदी के साथ–साथ चल रहा था I पानी के लिए कोई गढ्ढा देख ही रहा था कि, मैंने देखा सडक दुबारा ऊपर की ओर जा रही है I मेरा दिमाग सुन्न सा होने लगा  

एक तो इतना नीचे उतरकर आया और वापस उसी ऊंचाई पर चढ़ना पड़ेगा!  तभी मेरी नजर जहाँ से सडक ऊपर चढ़ रही थी , वहां बहते एक झरने पर पड़ी  


तभी मेरी नजर जहाँ से सडक ऊपर चढ़ रही थी , वहां बहते एक झरने पर पड़ी

मैं झरने को देख कर लगभग भागते हुए कदमों से उसके पास पहुंचा I ऊपर झरने की तरफ देखा तो मेंरा अनुमान सही था वो पानी की सप्लाई 'लाइन' वहीं से जुडी हुई थी झरने के बहते पानी को पार करने के लिए एक छोटा-सा पुल बना हुआ था मैंने ग्लूकोज का डब्बा निकाल कर ढेर सारा ग्लूकोज फांक लिया और जी भर कर पानी पी लिया अब वापस चढना था और मैं बुझे क़दमों से ऊपर की ओर चढने लगा  

ऊपर चढने के बाद मुझे दूर मन्त्र लिखी पताकाएं हवा में लहराती दिखाई दीं वो ‘पुखताल गोम्पा’ की सीमा थी मेर क़दमों में तेजी आ रही थी I मन्त्र लिखी पताकाएं जैसे-जैसे नजदीक आ रही थी; मैं उतने ही जोश से आगे बढ़ने लग गया I पीछे देखा तो विदेशी तो आते दिखाई दिए, पर प्रकाश जी और नीरज का कहीं पता नहीं मैंने सोचा , अब इकट्ठे ही ‘पुखताल’ पर ही इंतजार करूंगा
 
हरे रंग के बोर्ड पर ‘PHUKTAL’ लिखा दिखा, वहीं नजदीक ही मन्त्र लिखी पताकाएं हवा में फडफड़ा रही थीं मैं जैसे ही पुखताल गोम्पा के ‘गेस्ट हाउस ‘ के पास पहुंचा और मेरी नजर गोम्पा की तरफ गई , तो मैं मंत्रमुग्ध सा रह गया I इस वीराने में एक शहर-सा बसा हुआ था अमरनाथ की गुफा जैसी गुफा और उसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के निवास ऐसे लग रहे थे; जैसे पूरा शहर हो उसी में बौध्द मंदिर भी था I अद्भुत था वो दृश्य !!  मेरे जीवन में ऐसा मैंने कभी नहीं देखा I गेस्ट हॉउस से गोम्पा की दूरी लगभग एक किलोमीटर और थी

गेस्ट हॉउस से गोम्पा की दूरी लगभग एक किलोमीटर और थी

मैंने अब प्रकाश जी और नीरज का इंतजार करने का फैसला किया और चमकती तेज धूप में मुंह पर कपड़ा डाल के गेस्ट हाउस के बिना घास वाले लॉन में पसर गया I थक कर चूर था , पर मन में गोम्पा तक पहुँचने का सुकून भी ............. 
  
मित्रों यहाँ मैं क्षमा चाहूंगा । लेख ज्यादा लम्बा हो जायेगा । 'पुखताल गोम्पा' और इसके रहस्य तथा और फोटो के लिए एक भाग और जारी रहेगा ................... 

पहला और तीसरा भाग पढने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें:-

Wednesday, September 03, 2014

पुखताल गोम्पा : एक छुपी हुई , रहस्यात्मक दुनिया (भाग –एक) Phukhtal Gompa


11 से 13 अगस्त, 2014 

श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरते ही नथुनों से बड़ी साफ –साफ सी और नाजुक सी हवा टकराई I बड़ा अच्छा लग रहा था I  सूरज प्रखरता से निकला हुआ था , इसलिए धूप जरूर थोड़ी चुभ रही थी I  यहाँ से सफर शुरू करते हुए ये जरा भी अहसास नहीं था कि , सफर के  अंत तक एक रहस्यमय छुपी हुई और अनजान दुनिया को देखने का दुर्लभ अवसर मिलेगा I हालाँकि इस यात्रा में ‘तन–मन–धन’ तीनों  उम्मीद से ज्यादा ‘खर्च’ हो गए I  

डल झील में शिकारा 



श्रीनगर से कारगिल तक तो सड़क ठीक थी , पर कारगिल से पदुम तक लगभग 250 किलोमीटर तक वाहनों के आने – जाने से जो रास्ता बना था , उसे ही सडक कह सकते हैं I  गाँव और खेत तो पीछे छूट गए पर पहाड़ और नदी साथ हो लिए I  हिमनद (ग्लेशियर) भी  हमारी इस यात्रा के गवाह बने I  


हिमनद (ग्लेशियर) भी  हमारी इस यात्रा के गवाह बने I

रात 09-10  बजे तक ‘रांग्दुम’ की सीमा में प्रवेश कर चुके थे I  सौर उर्जा से प्रकशित ये गाँव उस वीराने में बड़ा सुकून पहुंचा रहा था I  ड्राइवर ‘जफर’ ने गाड़ी ‘जे & के ‘ ट्यूरिज्म के गेस्ट हाउस की चारदीवारी में प्रवेश कराई तो ‘रामसे ब्रदर्स’ की फिल्मों के डाक बंगले याद आ गए I जब आँखे थोड़ी देखने की अभ्यस्त हुई तो पता चला कि ये जगह जनविहीन नहीं है I  जफ़र  सुबह साढ़े चार बजे उठने का फरमान सुना कर  अपने ड्राइवर भाइयों के कमरे में जा चुका था I  मुझे नीरज जाट के सुबह चार बजे उठने पर शक था, क्या पक्का यकीन था कि ये नहीं उठ पायेगा I  

हम (मैं और प्रकाश यादव जी ) ठण्ड और भूख से लड़ने की योजना बना रहे थे , नीरज अपने कैमरे के ट्राईपोड और अपने फोटोग्राफी के हुनर को आजमाने में व्यस्त हो गया था I  अचानक बाउंड्री के बाहर से आवाज आई , “ इधर आओ !! भाई इधर आओ !!”  मैंने पुछा, ‘क्या हुआ ?’                                                                                                                                                            
नीरज की आवाज – ‘भाई मजा आ ग्या!’ ..............

असल में स्वच्छ चांदनी रात में उसकी फोटो बहुत अच्छी आ रही थी और हम इस सोच में थे कि ट्राईपोड उधार मिलेगा तो अगली लोकेशन पर अपन भी हाथ आजमा ही लेंगे , उस टाइम ठण्ड और भूख के कारण फोटो खींचने का मन भी नहीं कर रहा था I  

मैंने बेमन से खाना खाया और अपने कमरे में चल दिए ...........

        ‘सर्वाइकल’ की बीमारी के बाद मुझे स्टेराइड दिए गए थे I  इसलिए  अपने खर्राटों (जो कि अब कम हो चुके थे ) को ले कर भी सशंकित था I  मैं नहीं चाहता था कि कोई मेरी वजह से परेशान हो I  छ: सौ रुपये के एक कमरे में दो बेड लगे हुए थे , प्रकाश जी और नीरज को धरम संकट में न डालते हुए मैंने ‘भूमि –शयन’ की घोषणा कर दी I मन में कहीं ये भी था कि, अगर वो बेड पर सोते हैं, तो एक सुविधा के बदले दूसरी असुविधा (खर्राटे) बर्दाश्त कर लेंगे I  
माने के शीर्ष पर भगवान भास्कर की किरणे


सुबह साढ़े तीन बजे दरवाजे पर दस्तक हुई , मुझे ठण्ड के  मारे नींद नहीं आई थी I  मैं जाग गया था, लेकिन तेल और तेल की धार (नीरज को ) देखने के चक्कर में रजाई में ही पड़ा रहा I  प्रकाश जी भी जाग चुके थे , लेकिन गरम रजाई से बाहर निकलने की उनकी भी इच्छा नहीं हो रही थी I ड्राइवर एक बार  हार कर  पुनः दरवाजा पीटना  शुरू कर चुका था , हमने आवाज लगाई कि,  हम जग चुके हैं , जिससे वो दरवाजा पीटना तो बंद करे I   मैं और प्रकाश जी उठ कर  “बूट ” होने लगे थे , पर नीरजवा ‘बुत’ बना पड़ा था I   

.............खैर हमें और सामान को लाद कर ‘स्कोर्पियो’ ‘जे & के ‘ ट्यूरिज्म के गेस्ट हाउस की चारदीवारी से बाहर निकल चुकी थी I शांत और स्वच्छ चांदनी रात में साफ़ दिख रहा था कि गाड़ी सड़क छोड़ के ऐसी जगह चल रही थी , जहाँ पानी बहा हो I  ...........बहुत बड़ा एरिया था वो ,लगभग चार –पांच किलोमीटर .........कंकड़ ही कंकड़ ...पत्थर ही पत्थर !! रास्ता रहस्यात्मक होता जा रहा था !



कुछ आगे जाने पर एक नाका सा मिला और उम्मीद के उलट भारतीय सेना का जवान मुस्तैद मिला ( सेना और जवान को अपन सैल्यूट करता है ) I सभी के ‘इंडियन्स’ होने की पुष्टि करने के बाद हमें बिना किसी फोर्मलिटी के जाने दिया गया I 

‘जफ़र’ उजाले के साथ ही अपनी गाड़ी की गति बढाता जा रहा था ...............
आसमान में राख-सी रंगत बिखरने लगी थी और धीरे –धीरे सूर्य रश्मियाँ पर्वत शिखरों पर उतरने लगीं थी I ‘हिमावर्त ‘ पर्वत शिखरों पर भगवान भास्कर की सुनहरी किरणों ने अपनी आभा बिखेरी तो , ऐसा लग रहा था , जैसे कोई पीताम्बर पहने तपस्वी अपने अटल तप में रत हो I  कोई ‘मेनका’ और ‘रम्भा’ नहीं थी , उनकी तपस्या भंग करने के लिए  I 

पर्वत शिखरों पर भगवान भास्कर की सुनहरी किरणे

गाड़ी के हिचकोले खाने और तेज गति से चलने के बावजूद ये दृश्य कैमरे में कैद हो रहे थे I लगभग ‘वनस्पति – शून्य’  इस उजाड़ सौन्दर्य को हम देखते हुए आगे बढे जा रहे थे ......और ‘पेंजिला पास ‘ से नीचे उतरने का अहसास हुआ ; क्योंकि नीचे दूर तक पथरीली सड़क  और  मैदान सा दिखाई दे रहा था I 14000 फीट पर इसका टॉप है , जिसे ‘पेंजिला टॉप’ कहते हैं I 
‘पेंजिला टॉप’

ड्राइवर ‘जफर ‘ को पदुम पहुँचने की जल्दी थी पर हमें बिलकुल नहीं I  मैं चाह रहा था कि ये गाड़ी रोकता हुआ चले , जिससे मैं फोटो खींच पाऊं I  पता नहीं इस रास्ते से जीवन में दुबारा आना हो कि नहीं !

सवेरा हो चुका था I पदुम से भोर में निकलने वाली गाड़ियाँ हमें मिलने लगी थी I  

पदुम से भोर में निकलने वाली गाड़ियाँ हमें मिलने लगी थी I 

एक खरगोश जैसा जीव भी मिला ; प्रकाश जी ने बताया कि ये ‘मरमोट‘ है I  हमने ड्राइवर से पूछा तो उसने बताया इसे यहाँ ‘फ्या’ बोलते हैं I   

‘फ्या’
  सोचा कुछ फोटो लूं , पर एक तो गाड़ी की स्पीड और दूसरे ड्राइवर और नीरज की इसमें कोई रूचि न होने की वजह से मैं जैसी फोटो लेना चाह रहा था,  वैसी फोटो नहीं ले पाया I   

गाड़ी एक पुलिस चैक पोस्ट पर रुकी I जफर गाड़ी की एंट्री करवा कर वापस आया और नाके के आगे एक दुकान पर गाड़ी रोक दी I  ये चाय नाश्ते की छोटी सी दुकान थी I 

चाय नाश्ते की छोटी सी दुकान
 हमने दुकानदार से चाय और बिस्कुट के लिए बोला I  जफर को भी चाय के लिए बोला, तो वो अचानक एक तरफ को भागता हुआ सा चला गया I   हम आवाज दे ही रहे थे की दुकानदार , जो कि एक बौद्ध था बोला, “सर जी वो नहीं पिएगा I “
हमने पूछा , ‘क्यों ?‘
तो दुकानदार बोला , ‘ मुसलमान हमारे यहाँ कुछ खाते –पीते नहीं हैं  I“
हम माजरा समझ चुके थे I 

अबरान में दुकानदार के साथ नीरज

ये ‘अबरान’ नाम का एक छोटा सा बौद्ध गाँव था I मेरे दिमाग में बार- बार यही एक बात आ रही थी कि , इस गाँव तक हमें पहुँचने में लगभग तीन दिन हो चुके थे और हमें इससे भी बहुत रिमोट एरिया में जाना था I कैसे जीवन जीते होंगे यहाँ के लोग !!

पदुम नजदीक आता जा रहा था I 

सड़क के गेट पर बौद्ध माने
कुछ किलोमीटरों का फासला तय करने के बाद पक्की सडक आ गई थी I  पदुम से पहले ‘सानी’ या ‘सैनी’ ऐसा गाँव आता है , उस गाँव में छोटे से तालाब के किनारे बुद्ध की मूर्ति दिखाई दी I बड़ा सुन्दर दृश्य था , लेकिन उस ‘जफर’ को अब कुछ ज्यादा ही जल्दी थी I अफ़सोस फोटो नहीं ले पाया I

पदुम की सीमा में प्रवेश करते ही किसी यूरोपियन पहाड़ी गाँव का सा एहसास हुआ I भीड़ भाड बिलकुल नहीं I वाहनों की रेलमपेल भी नहीं I स्कूली बच्चे अपने स्कूल के लिए जा रहे थे I दूर – दूर बिखरे हुए घर I
आखिर ‘जान्सकर वैली’ के एक प्रमुख शहर ‘पदुम’ में हम पहुँच ही गए I  लगभग 250 किलोमीटर चलने के बाद भी अभी हम कारगिल जिले में ही थे I हमारे यहाँ मैदानों में तो इतनी दूरी पर राज्यों की सीमा बदल जाती है I

जहाँ एक ओर पदुम पहुँचने का सुकून था तो , दूसरी ओर वहां से लगभग पचास किलोमीटर आगे, जहाँ तक सडक थी , ‘अनमु ‘ पहुँचने की फ़िक्र भी I पदुम से आगे शेयरिंग टैक्सी या पर्सनल टैक्सी के अलावा कोई साधन नहीं था I हमने जफर से बात की तो उस वक्त उसने कोई जवाब नहीं दिया I पदुम कस्बे में पहुँच कर उसने अपनी गाड़ी एक मुसलमान होटल के आगे सड़क के किनारे रोक दी I एक जगह को छोड़ पूरे सफ़र में उसने यही किया था I मैं शाकाहारी था और सोच रहा था कोई शाकाहारी होटल मिल जाये I हालाँकि यहाँ बौद्ध भी मांसाहारी ही हैं I 
 
हमने सामान उतारते हुए पुछा की ‘अनमु’ छोड़ने के क्या लोगे ?
जफ़र बोला , “पांच हजार’
नीरज ने कहा , ‘छोडो , इसके जाने का मन नहीं है I”
हम सामान उतार कर किसी अच्छे होटल और गाड़ी की तलाश में आगे बढ़ लिए I
 एक अच्छे से रेस्टोरेंट टाइप होटल में अपना सामान डाल कर अपनी पसंद के खाने का आर्डर दे दिया I अपन मैगी से ही काम चला रहे थे I ‘मोमोज’ मुझे अच्छे नहीं लगे I 

 पदुम से अनमु के लिए कोई टैक्सी नहीं मिल रही थी और जो मिल रही थी वो 3500 -3000 रुपये के बीच किराया (पचास किलोमीटर दूर का )  मांग रहे थे I यहाँ से विदेशी ‘अनमु’ के लिए खूब जाते हैं , तो मैंने सोचा कि विदेशियों को साथ ले लें तो किराया बंट जायेगा और हमें सस्ता पड़ेगा I 

पदुम में टैक्सी का इंतजार

अनमु की ओर
मैंने एक विदेशी जोड़े से बात की तो वो भी ‘अनमु’ जाना चाहते थे , पर वो पर हेड 400 रुपये से एक भी रूपया अधिक नहीं देने पर अड़े हुए थे I  हम भी परेशान से हो गए थे, सोचा आठ सौ इनसे लेकर बाकि हम तीन मिल कर दे देंगे I बड़ी झिक-झिक के बाद गाड़ी चलने  लगी तो , उन विदेशियों ने एक शर्त और रख दी I शर्त ये कि, हम बीच की सीट पर ही बैठेंगे I मेरा दिमाग भन्ना गया ! एक तो पैसे कम और उस पर सीट भी पसंद की !! वाह! हम ही बेवक़ूफ़ मिले ! फिर मैंने सोचा मान  लो, नहीं तो आठ सौ रुपये भी जेब से देने पड़ेंगे I हमारे लिए समय कीमती था I  मैं और प्रकाश जी मन मार कर पीछे बैठ गए I 

पदुम से कुछ दूर चलने के बाद खतरनाक रास्ता शुरू हो गया और मैं नींद के आगोश में समाता चला गया .............                    
शेष अगले भाग में जारी .......
एक रास्ता
हिमनद (ग्लेशियर )
बेहतरीन लोकेशन पर एक घर
ये रास्ता तो फिर भी बढ़िया है
माने और मस्जिद ही दिखाई देती  हैं........मंदिर नहीं !
अगला भाग पढने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें :-
पुखताल गोम्पा : एक छुपी हुई , रहस्यात्मक दुनिया (भाग –दो ) Phukhtal Gompa  
पुखताल गोम्पा : एक छुपी हुई , रहस्यात्मक दुनिया (अंतिम भाग –तीन ) Phukhtal Gompa

Saturday, July 13, 2013

तू खुल्ला सांड बन जा ....... और इंडिया गेट पर मोमबत्तियाँ जलाते रहना , फिर किसी मासूम के लिए!!

दिल्ली में सामूहिक बलात्कार का शिकार बनी 'निर्भया' का फैसला ग्यारह जुलाई को आने वाला था ,समाचार चैनलों पर ये लाइन चलने लगी थी। बीच-बीच में एक-दो म्यूजिक चैनलों को भी पुराने गानों की तलाश में टटोल रहा था। तभी एक फिल्म (रब्बा मैं क्या करूँ ) के प्रोमो को देखा और सुना। 

गाने के बोल देखिये, "दुनिया एक तबेला है, कन्ट्रोल छोड़ कोई कांड कर जा; तू खुल्ला सांड बन जा!!"                               

माना कि फिल्मों को मनोरंजन के रूप में लिया जाना चाहिए, लेकिन समाज का आधे से भी आधिक तबका फिल्मों से चेतन व अवचेतन रूप में प्रभावित रहता है।  मैं कोई समाज सुधारक नहीं हूँ, लेकिन समाज में रहता हूँ और उस में घटित घटनाओं से प्रभावित भी होता हूँ। मानसिक दीवालियेपन की हद है इस गाने के बोल!! 

क्या स्वच्छन्दता  को हवा नहीं देते हैं इस तरह के गाने ? क्या सेंसर बोर्ड में मूर्ख बैठे हैं? बहुत आसान है बिगाड़ना, मेहनत बनाने में लगती है। जो देश तप, त्याग, आत्मसंयम की बातें करता था, वो अचानक "दुनिया एक तबेला है, कन्ट्रोल छोड़ कोई कांड कर जा; तू खुल्ला सांड बन जा!!"  कहने लगे तो शक होता है कि, इसके पीछे कोई और ताकतें काम तो नहीं कर रही हैं?  

मैं माननीय पाठकगण से जानना चाहता हूँ कि, इस गाने को गाने वाले, लिखने वाले, फिल्म में डालने वाले आदि-आदि के घर-परिवार, माँ, बहन, बेटी नहीं होंगी या वो ये भूल जाते हैं कि, जिन्हें वो 'खुल्ला सांड' बना कर 'कांड करवाना' चाहते हैं, उन 'सांडों का रुख' उनके घरों की तरफ भी हो सकता है। 

तमाम 'मोमबत्ती ब्रिगेड' भी सवालों के घेरे में आ जाती है कि, कहीं फैशन के लिए और चर्चा में रहने के लिए तो वो ये सब नहीं करते ? अगर वो वाकई गंभीर हैं तो इस तरह की बातों का विरोध क्यों नहीं?

 तमाम हताश करने वाली बातों के बीच एक स्वच्छ हवा के झोंके की तरह "भाग मिल्खा भाग" देखी। एक बेहतरीन फिल्म। ये फिल्म मेरी राय में टैक्स फ्री होनी चाहिए। फिल्म शुरू होने के साथ ही मन में स्पंदन शुरू कर देती है। सफलताओं के पीछे के सच को दिखाने के लिए पूरी फिल्म यूनिट को साधुवाद!!  
साभार : गूगल
 बीमार हूँ कम लिखा, ज्यादा समझना।

Saturday, May 25, 2013

'एक रुपये' की यादें !! Remembering Of One Ruppe.

बिस्तर पर सोते वक्त जेब से सरक कर 'एक रुपये' का सिक्का गिर गया। नींद आ नहीं रही थी, करवट बदलते ही सिक्का मेरे सामने आ गया। हाथ में उठा के उसे देखा। पहले तो 'अठन्नी' लगा, लेकिन 'एक' रूपया देखते ही कन्फर्म हो गया कि 'एक रूपया' ही है।

आदमी के 'ईमान' की तरह ही 'एक रुपये' का सिक्का भी छोटा हो गया है। एक कंपनी तो एक रुपये में विडियो दिखा रही है। विडियो तो हम आज से तीस साल पहले भी एक रुपये में ही देखते थे। लेकिन वो पूरी फिल्म होती थी।  अक्सर आमिता बचन (अमिताभ बच्चन) की फिल्म ही देखी जाती थी।

मुझे याद है हम तीन -चार दोस्तों ने सर्कस देखने के लिए घर वालों से एक-एक रुपये मांगे थे , एक दोस्त ने सलाह दी आज वीडियो पर 'मर्द' लगी हुई है, क्यों न सर्कस की जगह मर्द देखी जाये? मुझे छोड़ कर सब ने 'मर्द' देखी। मैंने 'मर्द' के लिए पैसे मांग कर ही 'मर्द' देखी (उस ज़माने में फिल्म के नाम पर पैसे बहुत मुश्किल से मिलते थे, हाँ! धार्मिक फिल्मों के लिए मिल जाते थे )। 

पिताजी से दस पैसे मांगते हुए बड़ा भोला-सा मुहँ बनाना पड़ता था, आवाज भी तोतली बनानी पड़ती थी। कई बार तो पैसे की बजाय डांट मिलती थी ..................' पढाई-लिखाई तो है नहीं!! ....बस पैसे दे दो।'  पैसे मिलने से पहले ही ऑडिट भी हो जाती थी।

 कभी-कभी पिताजी का मूड अच्छा हो तो एक रुपये का सिक्का मिल जाता था। हाथ में आते ही उसको देखना और जेब में डाल कर भी उसे पकडे रखना। एक या दो दिन तक तो उसे खर्च ही नहीं कर पाते थे। दोस्तों में शान बघारते ..'देख मेरे पास एक रूप्या!!'  
 
 सिक्के को हाथ में पकडे - पकडे ही नींद आ जाती थी। सतरंगे सपनों का वो संसार बिखरता था, कि आज मुकेश अंबानी खरबों की संपत्ति होते हुए भी, वैसे सपने नहीं देख पाता होगा।


एक रुपये का सिक्का
उस एक रुपये का भी बजट बनता और बिगड़ता था। इन दिनों (गर्मियों) में दस पैसे की गुल्फी (बर्फ़ में सेक्रिन और रंग डाल कर बनाई  जाती है) जरूर खाई जाती थी। एक रुपये में  रूह आफ़जा डाल कर बनाई गई लस्सी ...........आज भी वो स्वाद भूला नहीं है। किसी ठेले पर बर्फ के तुकडे को कपड़ा लगा कर घिसता हुआ आदमी और 'रद्दे' के  नीचे घिसकर इकट्ठी हुई बर्फ को गोल बना कर कई रंगों से सजा कर देता था, तो मुंह में बरबस पानी आ ही जाता था।


पिपरमेंट की गोलियाँ , गुडिया के बाल , लट्टू, फिरकी , सीटी, आदि - आदि पता नहीं कितनी चीजें ख्वाबों को पंख लगाती  थीं । कागज के एक बड़े से पन्ने पर इनामों के साथ 'चिट' चिपके रहते थे, कभी-कभी उन पर भी हाथ आजमाया करते  थे। अक्सर लालच में हमारी जमा-पूँजी डूब जाया करती थी। चूरन और चूरन की गोलियों के चटकारे ............हई!!!  मज़ा आ जाता था। पानी की पतासी (गोल-गप्पे), कचौरी ................. यादों का सैलाब आपने साथ बहाता ले जा रहा है .........................।


पांच पैसे , दस पैसे , बीस पैसे, चवन्नी, अठन्नी,  बारह आना,  सोलह आना ...........  हमारी सोच, ख्वाब और सपने यहीं तक थे। इससे आगे न तो हम सोच पाते थे और न ही सोचने या मांगने की इजाजत थी।  मुद्रास्फीति इतनी बढ़ी की आज भिखारी भी एक रूपया नहीं लेते।

'प्रेमचंद' की कहानी 'ईदगाह' पढ़ के आज भले ही आंसू आ जाते हों , उम्र के उस दौर में वो कहानी अच्छी नहीं लगती थी। बचपन तो सिर्फ यही सोच पाता  है कि, बड़ों के पास  रुपयों पैसों की कोई कमी नहीं होती। प्रेमचंद का 'हामिद' वक्त से पहले बड़ा हो गया था। 

एक बार रस्ते चलते चवन्नी पड़ी मिली थी, उसके बाद तो न जाने कितने दिनों तक उसी जगह पर पहुंचते ही निगाहें चौकस हो जाती थी, कि शायद कोई और (चवन्नी) मिल जाये।  

गर्मियों में हम गाँव जाते थे, रेलवे स्टेशनों पर वजन तोलने वाली मशीनों के रंगीन बल्ब और बत्तियां बहुत आकर्षित करते थे। उस के ऊपर लिखा होता था ,"दस पैसे यहाँ डालें।" और दस पैसे का चित्र बना होता था। दस पैसे मांग कर ले जाते थे और बड़ी अदा से  उस खांचे में डालते थे,  कभी टिकट आ गया तो खुश; नहीं तो मशीन को ठोकते हुए और मुकद्दर को  कोसते हुए चुप होकर बैठ जाते थे।

अक्सर बड़े रेलवे स्टेशनों पर लकड़ी के तरह-तरह के खिलौने चटक रंगों में रंगे, बेचने वाले 'कट-कट-कट -कट' की आवाज के साथ बेचते थे, लेकिन हमारे बजट से बाहर होने और पिताजी के समझाने पर भविष्य में खरीदने के लिए छोड़ दिये जाते थे।

कंचे वाली बोतल (जिसके गले में कंचा फंसा रहता था ) उस वक्त पचास पैसे और बाद में एक रुपये की आती थी। ठेले वाले से  मांगते ही ठक्क!! की आवाज के साथ धुआं सा निकलता और बोतल हमारे हाथ में होती थी। देवताओं का 'सोमरस' भी हमारे पेय के सामने लज्जित हो जाता।  


एक रुपये का नोट

यादों में खोयें तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। चाहे कुछ भी हो व्यक्ति 'अतीतमोही' होता ही है और अपनी यादें सबको प्यारी लगती हैं। किन्तु ये भी सत्य है कि, लोगों का नजरिया और आनंद की परिभाषाएं भी बदल गई हैं। आदमी के 'मूल्य' एक रुपये की 'मूल्य' की तरह ही अपना वजूद खोते जा रहे हैं।