Saturday, May 25, 2013

'एक रुपये' की यादें !! Remembering Of One Ruppe.

बिस्तर पर सोते वक्त जेब से सरक कर 'एक रुपये' का सिक्का गिर गया। नींद आ नहीं रही थी, करवट बदलते ही सिक्का मेरे सामने आ गया। हाथ में उठा के उसे देखा। पहले तो 'अठन्नी' लगा, लेकिन 'एक' रूपया देखते ही कन्फर्म हो गया कि 'एक रूपया' ही है।

आदमी के 'ईमान' की तरह ही 'एक रुपये' का सिक्का भी छोटा हो गया है। एक कंपनी तो एक रुपये में विडियो दिखा रही है। विडियो तो हम आज से तीस साल पहले भी एक रुपये में ही देखते थे। लेकिन वो पूरी फिल्म होती थी।  अक्सर आमिता बचन (अमिताभ बच्चन) की फिल्म ही देखी जाती थी।

मुझे याद है हम तीन -चार दोस्तों ने सर्कस देखने के लिए घर वालों से एक-एक रुपये मांगे थे , एक दोस्त ने सलाह दी आज वीडियो पर 'मर्द' लगी हुई है, क्यों न सर्कस की जगह मर्द देखी जाये? मुझे छोड़ कर सब ने 'मर्द' देखी। मैंने 'मर्द' के लिए पैसे मांग कर ही 'मर्द' देखी (उस ज़माने में फिल्म के नाम पर पैसे बहुत मुश्किल से मिलते थे, हाँ! धार्मिक फिल्मों के लिए मिल जाते थे )। 

पिताजी से दस पैसे मांगते हुए बड़ा भोला-सा मुहँ बनाना पड़ता था, आवाज भी तोतली बनानी पड़ती थी। कई बार तो पैसे की बजाय डांट मिलती थी ..................' पढाई-लिखाई तो है नहीं!! ....बस पैसे दे दो।'  पैसे मिलने से पहले ही ऑडिट भी हो जाती थी।

 कभी-कभी पिताजी का मूड अच्छा हो तो एक रुपये का सिक्का मिल जाता था। हाथ में आते ही उसको देखना और जेब में डाल कर भी उसे पकडे रखना। एक या दो दिन तक तो उसे खर्च ही नहीं कर पाते थे। दोस्तों में शान बघारते ..'देख मेरे पास एक रूप्या!!'  
 
 सिक्के को हाथ में पकडे - पकडे ही नींद आ जाती थी। सतरंगे सपनों का वो संसार बिखरता था, कि आज मुकेश अंबानी खरबों की संपत्ति होते हुए भी, वैसे सपने नहीं देख पाता होगा।


एक रुपये का सिक्का
उस एक रुपये का भी बजट बनता और बिगड़ता था। इन दिनों (गर्मियों) में दस पैसे की गुल्फी (बर्फ़ में सेक्रिन और रंग डाल कर बनाई  जाती है) जरूर खाई जाती थी। एक रुपये में  रूह आफ़जा डाल कर बनाई गई लस्सी ...........आज भी वो स्वाद भूला नहीं है। किसी ठेले पर बर्फ के तुकडे को कपड़ा लगा कर घिसता हुआ आदमी और 'रद्दे' के  नीचे घिसकर इकट्ठी हुई बर्फ को गोल बना कर कई रंगों से सजा कर देता था, तो मुंह में बरबस पानी आ ही जाता था।


पिपरमेंट की गोलियाँ , गुडिया के बाल , लट्टू, फिरकी , सीटी, आदि - आदि पता नहीं कितनी चीजें ख्वाबों को पंख लगाती  थीं । कागज के एक बड़े से पन्ने पर इनामों के साथ 'चिट' चिपके रहते थे, कभी-कभी उन पर भी हाथ आजमाया करते  थे। अक्सर लालच में हमारी जमा-पूँजी डूब जाया करती थी। चूरन और चूरन की गोलियों के चटकारे ............हई!!!  मज़ा आ जाता था। पानी की पतासी (गोल-गप्पे), कचौरी ................. यादों का सैलाब आपने साथ बहाता ले जा रहा है .........................।


पांच पैसे , दस पैसे , बीस पैसे, चवन्नी, अठन्नी,  बारह आना,  सोलह आना ...........  हमारी सोच, ख्वाब और सपने यहीं तक थे। इससे आगे न तो हम सोच पाते थे और न ही सोचने या मांगने की इजाजत थी।  मुद्रास्फीति इतनी बढ़ी की आज भिखारी भी एक रूपया नहीं लेते।

'प्रेमचंद' की कहानी 'ईदगाह' पढ़ के आज भले ही आंसू आ जाते हों , उम्र के उस दौर में वो कहानी अच्छी नहीं लगती थी। बचपन तो सिर्फ यही सोच पाता  है कि, बड़ों के पास  रुपयों पैसों की कोई कमी नहीं होती। प्रेमचंद का 'हामिद' वक्त से पहले बड़ा हो गया था। 

एक बार रस्ते चलते चवन्नी पड़ी मिली थी, उसके बाद तो न जाने कितने दिनों तक उसी जगह पर पहुंचते ही निगाहें चौकस हो जाती थी, कि शायद कोई और (चवन्नी) मिल जाये।  

गर्मियों में हम गाँव जाते थे, रेलवे स्टेशनों पर वजन तोलने वाली मशीनों के रंगीन बल्ब और बत्तियां बहुत आकर्षित करते थे। उस के ऊपर लिखा होता था ,"दस पैसे यहाँ डालें।" और दस पैसे का चित्र बना होता था। दस पैसे मांग कर ले जाते थे और बड़ी अदा से  उस खांचे में डालते थे,  कभी टिकट आ गया तो खुश; नहीं तो मशीन को ठोकते हुए और मुकद्दर को  कोसते हुए चुप होकर बैठ जाते थे।

अक्सर बड़े रेलवे स्टेशनों पर लकड़ी के तरह-तरह के खिलौने चटक रंगों में रंगे, बेचने वाले 'कट-कट-कट -कट' की आवाज के साथ बेचते थे, लेकिन हमारे बजट से बाहर होने और पिताजी के समझाने पर भविष्य में खरीदने के लिए छोड़ दिये जाते थे।

कंचे वाली बोतल (जिसके गले में कंचा फंसा रहता था ) उस वक्त पचास पैसे और बाद में एक रुपये की आती थी। ठेले वाले से  मांगते ही ठक्क!! की आवाज के साथ धुआं सा निकलता और बोतल हमारे हाथ में होती थी। देवताओं का 'सोमरस' भी हमारे पेय के सामने लज्जित हो जाता।  


एक रुपये का नोट

यादों में खोयें तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। चाहे कुछ भी हो व्यक्ति 'अतीतमोही' होता ही है और अपनी यादें सबको प्यारी लगती हैं। किन्तु ये भी सत्य है कि, लोगों का नजरिया और आनंद की परिभाषाएं भी बदल गई हैं। आदमी के 'मूल्य' एक रुपये की 'मूल्य' की तरह ही अपना वजूद खोते जा रहे हैं।

Monday, April 29, 2013

कुछ मुद्दे, जिन के बारे में सोचता रहा, कर कुछ नहीं पाया, चलो अब लिख ही लें।

मेरे आलस्य ने मुझको इतने दिन, मेरे ब्लॉग से दूर रखा। बीच-बीच में सोचा था, 'कभी लिख भी ले'  ; लेकिन सोच को शब्दों में नहीं ढाल पाया। मेरे कुछ दोस्त बहुत घूम रहे हैं और उसे हिंदी में लिख भी रहे हैं। रश्क होता है उनसे। हरी-भरी वादियों में घूम कर आते हैं। ईश्वर करे उनका घूमना बना रहे।

इधर राजस्थान में गर्मी बढ़ने लगी है। गर्मी तो पूरे देश में खास कर उत्तर भारत में बढ़ रही है , लेकिन कुछ ख़बरें मन को विचलित कर जाती है। मीडिया में अभी खबरे आ रही थी कि, महाराष्ट्र में सूखा पड़ा हुआ है, जिनमें सांगली और सतारा जिले प्रमुख हैं। अख़बार में एक खबर भी छपी थी कि, औरंगाबाद के लोग ट्रेनों के टॉयलेट से पीने का पानी भरते हैं।  खबर को इस लिंक पर चटका लगा कर देखा जा सकता है।



घर में एक बाल्टी पानी लेट्रिन में गिराते हुए भी बड़ी ग्लानी सी होती है। एक ही बाल्टी से नहा लेता हूँ। सुबह-सुबह जब ऑफिस के लिए निकलता हूँ,  तो लोगों को हाथ में नली पकडे 'तराई' करते देख मन दुखी होता है। घनिष्ठ हो तो टोक भी देता हूँ, "भाई साब फालतू पानी क्यों गिरा रहे हो?"

जैसे ही ऑफिस के लिए हाइवे पर चढ़ता हूँ, लकड़ियों और लट्ठों से भरे ट्रक जाते दिखाई देते हैं। मन में विचार आता है कि इतनी लकड़ियाँ आती कहाँ से हैं। क्या कोई सरकार नाम की चीज भी है? कोई विभाग जो इन सबकी निगरानी कर सके। आगे कुछ दूरी पर आरटीओ की गाड़ी खड़ी मिलती है। इन के सामने से सारे ट्रक निकलते हैं। खाकी वर्दी पहने आरटीओ के साथ के सिपाही रहस्यमय तरीके से, छुपे हुए से खड़े होकर ट्रक वालों से बातचीत करते हुए मिलते हैं (कागजात देखने की फार्मेलिटी जरूर खुले में की जाती है)।

ये विकास है या विनाश, कि सडकों के लिए ही लाखों पेड़ काट दिए गए।  क्या पेड़ो को काटे बिना, और पेड़ लगा  कर विकास संभव नहीं है ??

Courtesy:- Digital Agenda for Europe - European Commission
                                    

एक और चीज जो मुझे सबसे ज्यादा विचलित करती है वो है, रोज पचासों ट्रक लकड़ी के कोयले (ये तो मेरे देखते हुए हैं, बाकि कितने जाते होंगे राम जाने) का राजस्थान से दिल्ली की तरफ जाते हुए देखना। राजस्थान एक सूखा प्रदेश है। यहाँ वनस्पति और पेड़ -पौधे कम हैं। फिर कैसे ये लकड़ी के कोयले बनते हैं और सरकार तथा प्रशासन को पता तक नहीं है। क्या 'लकड़ी का कोयला माफिया' भी सक्रिय है?

दिल्ली से 'अप्पूघर' जयपुर आया या आ रहा है। लोग खुश हैं। मेरे मन में अगाध दुःख है। जिस क्षेत्र में 'अप्पूघर' बन रहा है,वो  नाहरगढ़ अभ्यारण्य के बिलकुल नजदीक है।लगभग चालीस हजार पेड़ों की बलि दी जा रही है। हजारों पशु-पक्षी बेघर हो जायेंगे या मर जायेंगे। सब खुश हैं कि अप्पूघर बन रहा है। एक मित्र हैं विष्णु लांबा जी, ये पर्यावरण के रखवाले हैं और इनको पुरस्कार भी मिल चुका है, इनसे भी कहा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। ये भी पल्ला झाड़ गए। अब रोज पेड़ों को  कटते हुए देखता हूँ। 'अप्पूघर का बड़ा सा बोर्ड' अब चिढाता है। उस क्षेत्र का इकोलोजिकल सिस्टम ख़राब हो चुका है और हो रहा है।

इस क्षेत्र में काफी हरियाली थी , लेकिन जयपुर विकास(?)प्राधिकरण की विभिन्न योजनाओं जैसे नॉलेज सिटी, BSF का ऑफिस और रहवास योजना, अप्पूघर आदि-आदि ......ने सारी हरियाली को ख़त्म कर दिया।   

इन्सान के लालच का भयानक नमूना है, जमीनों में इन्वेस्टमेंट!! लोगों की सोच देखो, "बच्चों के भविष्य लिए इन्वेस्ट कर रहें हैं!" हजारों-लाखों बीघा जमीन सिर्फ इस लिए वीरान (पेड़-पौधे विहीन) पड़ी है की उन पर प्लॉट कट चुके हैं। बच्चों का भविष्य?  हुह!!  कैसा भविष्य???  कौन समझाए?? धरती जीने लायक रहेगी ही नहीं तो, कैसा भविष्य ??

हमारे प्राकृतिक साधनों पर उद्योगपतियों और पैसे वालों की गिद्ध निगाहें लगी हुई हैं। पानी का दोहन करके कोल्ड ड्रिंक्स और बोतल बंद पानी बेचा जाता है। कोई  नहीं पूछता कि क्यों? क्यों आप हमारे हिस्से के पानी को बेच रहे हो और लाभ आप कमा रहे हो और हमारे हिस्से में प्यास बुझाने के लिए पानी तक नहीं!!

सरकारें नियम कानून बनाती हैं सिर्फ आम आदमी को डराने के लिए। राजस्थान में पिछले दिनों दो कानून बने एक तो पॉलीथिन को लेकर और दूसरा गुटखे को लेकर। शुरू-शुरू में तो काफी धर पकड़ हुई लेकिन, अब सब टांय-टांय फिस्स। धड़ल्ले से पॉलीथिन का प्रयोग हो रहा है। पर्यावरण गया तेल लेने!!

कभी-कभी लगता है, जिन्हें हम वोट देते हैं, जिन्हें हमारे टैक्स से तनख्वाह मिलती है, ये लोग सत्ता/पद  पर काबिज होते ही आम आदमी को जानवर समझते हैं कि, जिधर चाहे, जैसे चाहे हांक लो।

किसी भी पार्टी की सरकार हो वो, 'वो' नहीं करती है, जो जनहित में हो, बल्कि वो, 'वो' करती है, जो 'वो' करना चाहती है। करना 'वो' ही चाहती है, जिसमें मेहनत कम और प्रचार ज्यादा हो। राजनेता क्यों नहीं समझ पा रहे हैं  कि हम उसी डाल को या पेड़ को काट रहें हैं जिस पर बैठे हैं।

सितम्बर, 2012 में मैंने राजस्थान के प्रतिष्ठित अख़बार के कार्यालय में फोन किया। मैंने कहा, "सर मैंने जयपुर के पास  एक गिद्ध देखा है, और वो बीमार है। आपका अख़बार इस मुद्दे को उठता है। शायद बच जाये।" शायद मेरी बात भी पूरी नहीं सुनी होगी और फोन काट दिया गया। आम आदमी होना गुनाह हो गया?? क्या हुआ जो मैं सेलिब्रिटी नहीं हूँ?? बात तो सुन सकते थे!!! बिना मतलब की बातों से अखबार रंगे रहते हैं।
शायद वो गिद्ध मर गया होगा .............................
   
      इसी गिद्ध को बचाना चाहता था मैं


लेख जारी रहेगा .........(जल्दी नहीं .....आराम से प्रकाशित होगा)

Wednesday, August 08, 2012

मैंने कहा फूलों से हँसो तो वो खिल-खिला के हँस दिये!! Laughing Flowers

प्रकृति से मेरा लगाव बढ़ता जा रहा है। पता नहीं क्यों लोग पेड़ों को काट कर काठ -कबाड़ से अपने घरों को भरते जा रहे हैं। पहाड़ों पर जाकर धर्म के नाम पर कचरा और गन्दगी को फैला कर आ जाते हैं और हमारे द्वारा फैलाई गन्दगी को जोडी अंडरहिल (Jodie Underhill) जैसे विदेशी आकर साफ़ करते हैं। हम जिन नदियों , पहाड़ों और धार्मिक स्थलों को पूज्य मानते हैं उन्ही को गन्दगी और कूड़े से भर देते हैं । 

हमारे आचार-विचार में शुचिता कब आएगी ये तो मुझे पता नहीं, पर स्व-परिवर्तन मैंने शुरू कर दिया है। पहाड़ों पर मैं जाता हूँ, लेकिन वहां कुछ भी छोड़ कर नहीं आता हूँ; सिवाय अपने पैरों के निशान के। कोई बाहर से नहीं आएगा गन्दगी साफ़ करने। 

मैं ज्यादा नहीं लेकिन थोडा सा दूसरों द्वारा फैलाया कचरा अपने साथ जरूर नीचे लाता हूँ। अगर सभी लोग ऐसा करें तो हम स्वच्छ पर्यावरण अपने आने वाली पीढ़ी को सौंप कर जायेंगे। क्या आप नहीं चाहते की आप के बच्चे भी इस सुन्दरता को निहारें और देखें ??









पत्तियों पर पानी की बूंदों का ये दुर्लभ और मेरे जीवन का अब तक का सबसे बेहतरीन फोटो , जो भाई विपिन के सहयोग से संभव हो सका !!





है न!! प्रकृति का लाजवाब नमूना


इस यात्रा में इनको बहुत खाया मैंने !!










अद्भुत








भक्त कण-कण में भगवान को देखते हैं , इस फूल में भी भक्तों को गणेश जी दिखाई दिए !!




इस पोस्ट को पढ़ने वालों से निवेदन है कि, प्रकृति और पर्यायवरण को बचाने का संकल्प लें ! आज ही लें बाद में तो बहुत देर हो जाएगी !!

Friday, July 27, 2012

उत्तराखंड की ओर -अंतिम भाग (Uttrakhand ki or )

शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
'उत्तराखंड की ओर- भाग पांच' वाली पोस्ट मुझसे गलती से डिलीट हो गई थी , उसी पोस्ट को पुनः लिखा गया है।  
मैं कपडे सुखाने दो बार होटल की छत पर गया था एक तो पहले और एक उस दिन, जिस दिन हमें होटल छोड़ना था। पहले दिन जब मैं छत पर गया तो मैंने एक विदेशी को हाथ में स्टील के गिलास (में चाय) लिए बैठे देखा था । थोडा अजीब लगा, लेकिन उसके 'गुड मोर्निंग' के अभिवादन से हलकी सी 'अजनबीयत' कम हुई । 

जिस दिन होटल छोड़ना था उस दिन छत पर सूखे कपडे लेने गया तो वही विदेशी फिर बैठा दिखाई दिया। वही 'गुड मोर्निंग' की पहल के साथ उसने जो पूछा उसक हिंदी में सार यही था कि, 'उर्गम' और आसपास की जगह में देखने लायक क्या-क्या है? अपन को तो कुछ पता था नहीं, नीरज भाई से मिले ज्ञान को 'बघार' दिया और यहीं गलती कर गया । 'कल्पेश्वर महादेव' भ्रम वश 'रुपकेश्वर महादेव' हो गए। नीचे आकर नीरज को वाकया बताया तो 'जाट' के 'P4 मॉडल' के दिमाग ने भी मेरी गलती पकड़ ली और 'घुमक्कड़ महाराज' की व्यंगात्मक हंसी का सामना करना पड़ा । हंसी का सामना तो कर लिया, लेकिन एक बात और दिमाग में आई कि, यार! एक विदेशी को गलत बता आया । 

चैक आउट करने नीचे आये और होटल वाले से विष्णु प्रयाग जाने का रास्ता पूछने लगे । 'चार प्रयाग' हम पहले ही कर चुके थे, विष्णु प्रयाग के दर्शन करते ही 'पांचो प्रयाग' के दर्शन का कोटा पूरा हो जाता। होटल वाले ने जब बताया कि विष्णु प्रयाग यहाँ से दस किलोमीटर दूर है, तो हमारे 'पांचवे प्रयाग' के दर्शन के मंसूबों पर पानी फिर गया । 'विष्णु प्रयाग' को भविष्य के लिए छोड़ते हुए हमने (मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था , मैं तो जहाँ नीरज ले जा रहा था वहीं जा रहा था) कल्पेश्वर महादेव जाने का फैसला किया। जोशीमठ से दस किलोमीटर दूर एक जगह है 'हेलंग'; इसी हेलंग से हिरनावती नदी के साथ एक रास्ता जाता है । हेलंग में उतर कर साधन के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि, यहाँ से दो घंटे बाद उर्गम के लिए जीप जाएगी। दो घंटे का इंतजार हमारे लिए बहुत ज्यादा था ।


 मैंने नीरज से कहा, "यार क्यों न पैदल चला जाये? रास्ते में कोई साधन मिलेगा तो उसमें बैठ लेंगे। "नीरज को ये बात जंच गई और हम पैदल चल दिए कुछ दूर जाने पर मुझे कुछ याद आया और मैंने नीरज से कहा, ''यार अपन ने कुछ खाया तो है ही नहीं ।" हम लोग वापस मुड़ गए ढाबे कि ओर । 

ढाबे पर चाय और पराठों पर हाथ साफ़ कर ही रहे थे कि, होटल वाला विदेशी एक मिनी बस से उतरता दिखाई दिया । मन में हलकी सी ख़ुशी इस लिए हुई कि, दो से भले तीन हो जायेंगे और इसी ख़ुशी में मैंने उस को आवाज़ दे दी। मैं ढाबे के अन्दर था और उसे ठीक से दिखाई नहीं दिया, सो उसने समझा कि ढाबे वाला आवाज़ दे रहा है तो उसने अज़ब सी नृत्य की सी मुद्रा बनाई और उसका भाव यही था कि, ये ढाबे वाला भी मुझे बुला रहा है । थोड़ी देर बाद मैं बाहर उसके पास जाकर आया और उसे बताया कि, 'हम भी वहीँ जा रहें हैं, जहाँ वो जा रहा है।' उसने जवाब दिया कि,'वो अकेले घूमना पसंद करता है' और मैंने उसे 'ओके बाय' कह दिया। वो चाय पी कर हमसे पहले चला गया । 

जब हम वहां से चले तो अमेरिकी से पहले भी एक 50 -55 पेटे का विदेशी पुल पर करता दिख रहा था । हम लोग अपनी रफ़्तार से दृश्यों को कैमरे में पकड़ते हुए चलने लगे। नदी पुल से पार करने के बाद रास्ता उसी के साथ हो लिया और आगे चल कर एक रास्ता दायीं तरफ छोटे पुल को जा रहा था और एक रास्ता बायीं तरफ ऊपर चढ़ रहा था । मैंने नीरज से पूछा, "भाई किस तरफ ?" नीरज बोला, "रास्ता तो बायीं तरफ ऊपर चढाने वाला लग रहा है ।" हमने इंतजार करना शुरू किया, कि कोई आये और सही रास्ता बताये । थोड़ी ही देर में एक स्थानीय लड़का आता दिखाई दिया और नीरज ने 'लॉन्ग कट' के साथ 'शॉर्ट कट' भी पूछ लिया। फिर क्या नीरज ने 'शॉर्ट कट पकड़ लिया ।

 थोडा ऊपर चले ही थे कि वो 50 -55 पेटे का विदेशी सामान के साथ हांफते हुए बैठा मिला। नीरज के साथ मुझे भी हलका आश्चर्य हुआ कि जिस 'शॉर्ट कट' कि जानकारी को हम अनमोल मन रहे थे उस पर तो वो विदेशी पहले से चल रहा था। दो थके हुए मुसाफिर जब एक ही मंजिल पर चल रहें हों तो आँखों ही आँखों में बिना कुछ कहे कई बातें हो जाया करती हैं । इस विदेशी से हम लोग कुछ नहीं बोलते हुए उसे बैठा ही छोड़ कर ऊपर की ओर चढ़ने लगे। 

कुछ और ऊपर चले ही थे कि सांप कि तरह बल खाती सड़क पर एक जीप चढ़ती दिखाई दी। मैंने नीरज से कहा,'नीरज दौड़ ले जीप आ रही " मैं और नीरज लगभग हांफते हुए 'शॉर्ट कट' छोड़ कर 'लॉन्ग कट' पर गए। आती हुई जीप को हाथ दिया (उसमें ड्राइवर के अलावा एक और आदमी बैठा था) लेकिन उसमें बैठे लोगों ने उपेक्षा की नज़रों से देखा और गाड़ी बिना रुके ऊपर कि चढ़ाई चढ़ने लगी। गौर से देखा तो गाड़ी सरकारी लगी । असंवेदनशील उत्तराखंडी सरकारी गाड़ी । पीछे से खूब गलियां दी!! 

अपन फिर उसी 'शॉर्ट कट' वाले रास्ते पर आकर ऊपर चढ़ने लगे । एक छोटे पावर हाउस के पानी के लिए बनी एक सूखी पक्की नहर के अतीत की कल्पना करते हुए हम आगे बढ़ चले !! 
                                                                 सूखी पक्की नहर
अब प्यास लग आई थी । एक स्थानीय लड़का बैठा मिला। नीरज ने यहाँ से गाँव की दूरी और पानी की उपलब्धता के बारे में पूछना शुरू कर दिया । उसने बताया ऊपर गाँव में पानी मिल जायेगा । नीरज ने उस लडके का साथ पकड़ लिया और तेजी से ऊपर चढ़ने लगा मैं भी उनकी गति को पकड़ने की कोशिश करने लगा । 

एक थका देने वाली खड़ी सी चढ़ाई के बाद जब मैं ऊपर पहुंचा तो, नीरज और वो स्थानीय लड़का एक पेड़ के नीचे आराम करते मिले । मेरे वहां पहुंचते ही नीरज ने कहा ,"एक बुरी खबर है और एक अच्छी, बता कौन सी पहले सुनाऊं?" मैनें कहा," पहले बुरी सुना ।" नीरज बोला ,"गाँव में पानी नहीं है" मेरा माथा ख़राब हो गया । मैंने कहा,"यार ठीक -ठाक सा गाँव है और पूरे गाँव में पानी नहीं है?" 
और ख़ुशी की खबर कि ,"अब चढ़ाई ख़त्म हो गई है।" 

आदमी को जिस चीज की जरूरत होती है, आदमीं की निगाहें न चाहते हुए भी वहीं जाती हैं । मेरे साथ भी यही हो रहा था । मेरी नजरें लोहे के बिछे हुए पाइपों से होती हुई घरों के आसपास रखे हुए बर्तनों तक को टटोल रही थीं। पशुओं को पानी पिलाने के लिए बनाये गए हौद में पानी दिखाई दिया । मन किया की बोतल भर लूं, लेकिन सोचा क्यों न थोडा सब्र कर लिया जाये। प्यास के कारण छोटा रास्ता भी लम्बा लग रहा था । 



                                             सौन्दर्य दूर औए नजदीक से
 चलते -चलते आखिर गाँव के घर ख़तम हो गए और एक रास्ता दिखाई देने लगा । एक जगह बोर्ड लगा था और कोई सार्वजानिक भवन था, उस जगह एक औरत नल से कपडे धोती हुई दिखाई दी । अपन लपक लिए नल की ओर और बोतल में आधा पानी ही भरा था कि उसको पीना शुरू कर दिया । पानी पीने के बाद ही होश ठिकाने आये और गाँव कि सुन्दरता पर ध्यान गया । बोतलों में पानी भर कर हम लोग वहीं आराम से बैठ गए और फोटू -फाटू खींचने लगे। बोर्ड पर गाँव का नाम 'सलना' लिखा हुआ था। 

                                                              सुन्दरता पर ध्यान गया
यहाँ से अब हम धीरे-धीरे अपनी मंजिल यानि 'कल्पेश्वर महादेव' की ओर चल दिए । आगे जाने के बाद एक और बस्ती आई वहां सीमेंट से बने छतरीनुमा आश्रयस्थल में बैठ कर नीरज ने एक स्थानीय से'उर्गम'के बारे में पूछा । और उस स्थानीय से हमें पता चला कि,'उर्गम'कोई एक गाँव या जगह नहीं बल्कि बारह गावों का समूह है। उन लोकल भाई साब को 'थेंकु' बोल कर हम पंचधारा की ओर चल दिए। पंचधारा एक ऐसी जगह थी जहाँ पानी के स्रोत को पञ्च भागों में (पांडवों के नामानुसार ) विभक्त कर रखा गया था । पंचधारा के बाद नीरज ने 'मेट्रो कि स्पीड' पकड़ ली और मैंने अपनी गति और धीमी कर ली । 
                                                  नीरज ने 'मेट्रो कि स्पीड' पकड़ ली
नीरज तेजी से आगे चला जा रहा था और मैं धीरे-धीरे आँखों और कैमरे में दृश्यों को कैद करता हुआ चल रहा था । एक सुनसान सा मोड़ पार करते ही कुछ लोग नालियों की सफाई करते दिखे । जगह से ही आभास होने लगा था की, हमारी मंजिल यानी 'कल्पेश्वर महादेव' नजदीक ही हैं । 

आगे एक छोटे से मैदान में नीरज अपने जूते खोल कर बचे हुए बिस्कुटों पर अपनी घुमक्कड़ी का एहसान उतारता दिखाई दिया । पास ही पर्वतों से एक सुन्दर सा झरना गिर रहा था । मैंने नीरज से कहा ,"नीरज ट्रिपल जे ।" नीरज ने कहा, " मैं समझा नहीं ।" मैनें समझाया ,"जाट, जूते और झरना।" नीरज बोला,"एक फोटू ले।" और फोटू ले ली गई । 
                                                            जाट, जूते और झरना
मैंने भी बिस्कुटों की कुछ खेप अनिच्छा पूर्वक खाई और आगे चल दिया । 

रास्ता एक दम सुनसान सा था । वीरानी को दूर करने के लिहाज से कैमरे को साथी बनाया । लोहे के तारों पर बने पुल को पार करने के बाद भी नीरज नहीं आता दिखा तो पुल के तारों को सपोर्ट देने के लिए बने चबूतरे पर जा कर बैठ गया । कुछ समय बाद नीरज आता दिखाई दिया । 

                                                                नीरज आता दिखाई दिया
ऊपर चढ़ कर 'कल्पेश्वर महादेव' के दर्शन किये । मंदिर में एक बुजुर्ग पुजारी टाइप आदमी चद्दर तान के सो रहा था। हमारी चहल कदमी से ओढ़ी हुई चादर हटाकर देखा और हमारी चढ़ाव चढाने की ''औकात" को देखते और तौलते हुए वापस चादर ओढ़ कर सो गया । 

                                                                 कल्पेश्वर महादेव
कुछ समय बिताने के बाद हम लोग वापसी के लिए चल दिए। लोहे के तार वाला पुल पार करते ही हमें वो अमेरिकी झरने को निहारता सड़क पार बैठे दिखाई दिया। 

                                                                     'केल्विन'
हमें देख कर वो बहुत खुश हुआ,'मदर नेचर' उसके मुंह से यही निकला था । हमें ऐसे 'प्रकृति प्रेमी' बड़ी मुश्किल से दिखाई देते हैं । इतनी कठिन चढ़ाई और अनजाना देश !! झरने को मंत्रमुग्ध होकर उसका निहारना!! हम मन ही मन उसके प्रकृति प्रेम को सराह रहे थे। 

 बातचीत से पता चला की उसका नाम 'केल्विन' है और वो अमेरिका में कारपेंटर है!! एक "कारपेंटर" का प्रकृति प्रेम लाजवाब था !! उससे विदा लेकर हम वहां से चल दिए। 

रास्ते में वही विदेशी, जिसे हम नीचे छोड़ आये थे, आता दिखाई दिया। उससे भी हमने हलकी-फुलकी बात की और वो फ़्रांसिसी था । 

वापसी हमने तेज कर दी सलना गाँव आकर कुछ लोग आते दिखाई दिए । उनसे किसी साधन के बारे में पूछा तो बोले जल्दी जाओ एक पिकप जीप जाने वाली है बस फिर क्या था हमने दौड़ सी लगा दी। वहां पूछताछ की तो पता चला की जायेगी तो सही प़र सीटें फुल हैं। 
                                                     नीरज ने ऊपर अपना आसन जमा लिया
फिर क्या था नीरज ने ऊपर अपना आसन जमा लिया और मैंने भी !! जीवन में पहली बार पिकप के ऊपर बैठ कर खतरनाक पहाड़ी रास्ता प़ार कर रहे थे। मन ही मन उत्तराखंड वापसी के वादे को दुहराते हुए हमने हेलंग आकर जीप पकड़ ली और चमोली, हरिद्वार होते हुए घर!!