Wednesday, May 02, 2012

उत्तराखंड की ओर- भाग तीन

 यदि हमें पता लग जाये की ठीक एक साल बाद हमारी मृत्यु हो जायेगी तो हम क्या करेंगे?? जिंदगी को भय युक्त होकर या गुजारेंगे या मजे से जियेंगे? इस पर सबका अपना-अपना अलग नजरिया हो सकता है। जहाँ तक मेरा नजरिया है कि जीवन को आनंद और उल्लास से पूरा किया जाये क्योंकि मृत्यु एक साल बाद नहीं तो दस साल या पचास साल बाद तो निश्चित है ही। जीवन की भागदौड़ में हम इतने उलझ जाते हैं कि अहसास ही नहीं रहता कि मुट्ठी में रेत की तरह वक्त फिसलता जा रहा है और समय के द्वारा बुढ़ापे की ओर धकेल दिए जाते हैं । अंत में एक गन्दी सी मौत का इंतजार करते हुए दुनिया से अलविदा हो जाते हैं। जैसे -जैसे ये अहसास मेरे जहन में समाता जा रहा है , मैं अपने जीवन को सिरे से व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा हूँ । मैं जीवन में सुख नहीं, आनंद चाहता हूँ और आनंद ..................
बहती नदी का शोर


धुली -धुली सी सुबह
.............रुद्रप्रयाग की वो धुली -धुली सी सुबह और लॉज के पास से बहती नदी का शोर ऐसा लग रहा था जैसे कोई संगीत के स्वर हों। मैं नीरज से पहले सो कर उठ गया था और नित्य क्रिया के बाद इंतजार कर रहा था कि नीरज उठे और चाय पीई जाये । रुद्रप्रयाग को अपने कैमरे मैं कैद करने के बाद हम नन्दप्रयाग की ओर चल दिए। सड़क से ही 'नंदाकिनी' और 'अलकनंदा' दिखाई दे रही थी और दिखाई दे रहा था उनका संगम !! संगम का अटपटी जगह होने से नहाने के लिए हमने नंदाकिनी को चुना । शांत और स्वच्छ नंदाकिनी में नहाने लायक जगह चुनी गई । नीरज भाई थैली में अंगूर धोने में व्यस्त थे और मैं सोच रहा था कि कब पानी में कूदूं । नदी में बहता साफ़ पानी और मस्ती के लिए समय हो तो और क्या चाहिये? 

बहता साफ़ पानी और मस्ती के लिए समय हो तो और क्या चाहिये
नंदाकिनी में जम के कूदे और नहाये !! आनंद ही आनंद!!जिस आनंद और शांति के लिए लोग करोड़ों खर्च करने को तैयार हैं और ठग बाबाओं के चक्कर लग़ाते हैं, वो हमें मुफ्त में ही मिल रहा था!! आनंद के सागर में गोते लगाने के बाद हम लोग चमोली गए और चमोली से सीधे जोशीमठ की जीप पकड़ ली ! कई एक जगह ठंडी हवा ने शारीर को छुआ,नमी के अहसास से लगा की बारिश हुई है और ये अहसास सही था .....

....तथा बारिश का नतीजा?? पहली बार जीवन में 'लैंड स्लाइड 'देखा और देखा कि खाई के लगभग मुहाने पर एक जीप वाला तथा कुछ लोग एक फंसी हुई जीप को निकालने की जद्दोजहद कर रहे थे । और मैंने जब खाई में झांककर देखा तो एक सिहरन सी शरीर में उतरती चली गई। नीचे खाई में सब्जी का एक छोटा ट्रक छितराया पड़ा था।

खाई में सब्जी का एक छोटा ट्रक छितराया पड़ा था।
जहाँ से ट्रक फिसला था ठीक उसी जगह वो जीप भी फंसी हुई थी । आखिरकार सबके सामुहिक प्रयासों और हमारी दुआओं से फंसी हुई जीप निकल गई और जोशीमठ का रास्ता खुल गया । रात घिरते -घिरते हम लोग जोशीमठ पहुँच गए कमरा लिया और सारे उपकरण चार्ज पर लगा कर हम लोग भी निद्रा देवी की गोद में चले गए।

अगले दिन औली जाने के प्लान के साथ .....
क्रमशः ............

Sunday, April 22, 2012

उत्तराखंड की ओर- भाग दो

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हरिद्वार में ऋषिकेश के लिए 'उत्तराखंड  परिवहन' की  बस पकड़ ली, बस में चढते ही कंडक्टर नीरज से बोला," जब चलना ही था, तो उतरे क्यों थे ?" नीरज मेरी तरफ इशारा कर के बोला, "इस आफत को लेने उतरा था "

बस खाली सी ही थी।  हम आराम से बैठ गए ....'ऋषिकेश' नाम दिमाग में बार-बार टकरा रहा था, ऋषि +केश = ऋषि के बाल ।  मतलब क्या ऋषि के बाल? कोई तारतम्य नहीं बैठ रहा था।

हरिद्वार से निकलते ही हमें उत्तराखंड का विकास (विनाश) दिखाई दिया  सड़कें तो चौड़ी हो रही थी, लेकिन उसके लिए हजारों पेड़ों की बलि दी जा रहा थी मन खिन्न हो गया।

मैं घर से नक्शा -वक्शा तो देख कर चला नहीं था, हरिद्वार के बाद नीरज के भरोसे और उसी के हिसाब से चलना था। ऋषिकेश में उतरने के बाद 'फैंटा' पीया गया और फिर वहां से देवप्रयाग ।

देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा मिलती है, ये बात मुझे नीरज से ही पता चली साफ़ पानी देखकर मेरे 'मुंह में पानी' आ जाता है और मैंने बस में ही घोषणा कर दी की, मैं तो नहाऊंगा!!! 

देवप्रयाग में परांठे उदरस्थ करने के बाद संगम के लिए चल दिए भागीरथी का जल निर्मल, स्वच्छ और नीला दिखाई दे रहा था, वहीँ अलकनंदा का जल मिटटी युक्त था   
   मन्दाकिनी पर बने इस पुल को पार करके देव प्रयाग संगम पर गए थे
पानी का प्रवाह मेरी उम्मीद से ज्यादा होने के कारण कूद- कूद के नहाने के विचार को त्यागना पड़ा   वहीँ बैठे एक बुजुर्ग 'पंडित' ने प्लास्टिक का मग मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा ,"इससे नहा लो"   
 (यहाँ एक और बुजुर्ग "पंडित" ने मेरे हाथ में जल और दूब देने की कोशिश की और मैंने जरूरत से ज्यादा सख्ती से मना कर दिया। हालाँकि उनके मन्तव्य को समझ कर चलते वक्त मैं दोनों बुजुर्ग "पंडितों" को पांच-पांच  रुपये दे कर आया। हम धर्म करने नहीं, घूमने गए थे। (मुझे पेड़-पौधे,पर्वत, नदियाँ, झरने और प्रकृति के नानारूपों में ही ईश्वर के दर्शन होते हैं )

गंगाजी का जल जैसे ही शरीर से स्पर्शित हुआ, मन आनंद से सरोबार हो उठा, उस विचित्र आनंद को महसूस करने के लिए आपके मन के द्वार खुले हुए होने चाहिए (किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए बिना,बच्चे का सा मन )  एक नई दुनिया में प्रविष्ट होने के एहसास से सरोबार था मैं!!!!     
    वो नीचे संगम पर स्नान किया गया
                                                        
आनंद और नए एहसास को संजोये देवप्रयाग से रूद्रप्रयाग के लिए एक जीप में बैठ गए 

पर्वतों की ऊंचाई और अलकनंदा की गहराई बढ़ने के साथ ही मेरे मन में किंचित भय और विस्मय साथ-साथ आने लगे थे। मन में अख़बार और टीवी की बुरी खबरें जो देखी, सुनी और पढ़ी थीं, वो आंदोलित होने लगी थीं। 

उस डर को और गहराई से महसूस करने के लिए मैं खिड़की के पास बैठ गया था तीव्र मोड़ों और अच्छी व ख़राब सड़कों को पार करते हुए हम जीप से रुद्रप्रयाग की तरफ बढ़ रहे थे  अँधेरा घिरने के बाद श्रीनगर पार किया और रुद्रप्रयाग पहुँच गए  वहां उतरने पर बिजली गुल होने की वजह से अँधेरा छाया हुआ था   एक-दो लोग पास आकर बोले, ''होटल चाहिए?" हम लोग दूसरा  होटल देखने के विचार से आगे बढ़ गए आगे अँधेरा होने की वजह से होटल के लिए पूछने वाले उन्ही लोगों को बुला कर होटल दिखाने के लिए कहा  

छोटी टोर्च के उजाले में गन्दी और गीली सी सीढियाँ उतार कर वो शख्स हमें सड़क के स्तर से एक मंजिल नीचे ले गया, ये एक लॉज था  कमरा दिखाने के बाद बोला, "तीन सौ रुपये
हमने कहा, "ज्यादा है"
वो बोला,"टीवी भी है"            
हमने कहा,"बेकार है, लाईट नहीं आ रही है"    
अंत में वो दो सौ रुपये पे मान गया। 
खाना खाने के बाद सोने को हुए तो पलंग के नीचे 'कुछ' बजा, पलंग के  नीचे झांककर देखा तो पलंग के दो पायों की जगह पीपों पर टिका हुआ था और वो करवट लेते हुए बजते थे । 
         ये ही वो पलंग हैं, जिनके नीचे पीपे लगे थे
                                              
अगली सुबह .....अगले भाग में । 
क्रमशः .....

Saturday, April 14, 2012

उत्तराखंड की ओर- भाग एक

गूगल (google) पर नक़्शे देखते हुए मेरा मन फिर घूमने के लिए मचलने लगा था, ऐसा लग रहा था 'प्रकृति माँ' मुझे बाहें फैला कर पुकार रही हो की, आजा बेटा!! और मैं दौड़ कर उसकी गोद में दुबक  जाना चाहता था, उसके साथ खेलना चाहता था, रोमांचित और हर्षित होना चाहता था…. भाई नीरज के साथ उत्तराखंड जाने का जैसे ही कार्यक्रम बनाया , मेरी पत्नी और बेटी मुझे अहसास दिलाने लग गये थे, कि आप  एक जिम्मेदार पिता भी हो I 

जहाँ मैं 'प्रकृति का बेटा' बन कर घर से निकलना चाहता था, वहीं एक पिता के रूप में बेटी के शब्द "पापा मत जाओ" मेरे कदम घर से निकालने को रोक रहे थे I बड़े असमंजस कि स्थिति थी वो I  खैर .......


दो अप्रैल को बस से हरिद्वार के लिए चल दिया I  बस के दिल्ली पहुँचने पर नीरज से हरिद्वार में ही मिलने की बात तय हो गई थी I

इससे पहले भाई संदीप जाट से मोटर साईकिल से नेपाल जाने का कार्यक्रम तय करने की कोशिश की, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से वो नहीं जा  पाए ....खैर नेपाल बाद में सही I

हरिद्वार ऋषिकुल चौराहे पर उतरते ही नीरज को फोन लगाया, तो वो बोला कि, "ऋषिकुल चौराहे पर आ जाओ और एक किलो केले खरीद लेना, मैं बीस मिनट में आता हूँ"I चारों तरफ नजर दौड़ाई तो एक ठेले पर हरे केले दिखाई दिए I मैंने सोचा, उसे आ ही जाने दो तभी खरीदूंगा और वहीं थडी (चाय की दुकान) पर चाय वाले से एक चाय बनाने के लिए  कह दिया I चाय कांच के गिलास में फुल भर के थी और हमें राजस्थानी 'कट' पीने की आदत है I चाय हलक में जाते ही दिमाग ख़राब हो गया न अदरक, न लोंग..... चाय फेंकने का मन  करते हुए भी पांच रुपये का मोह उसे पीने पर मजबूर कर रहा था I

इधर नीरज के दिए हुए बीस मिनट आधे घंटे से भी ऊपर हो गए I सोचा क्यों न
'फ्रेश' (दीर्घ शंका) हो लिया जाये ('फ्रेश' शब्द 'दीर्घ शंका' के लिए प्रयोग करने पर नीरज को आपत्ति है) I

बोतल
ले कर एक नहर के किनारे झाड़ियों में सरक लिए और (जैसा मैं पूर्व अनुमान किये बैठा था)  नीरज का नाम मेरे मोबाईल की स्क्रीन पर चमकने लगा………..जल्दी से निवृत हो  कर बात की और उसे वहीं (नहर के किनारे ) आने की बात कह कर फोन  काट दिया I

अपने पेटेंट अंदाज में कानों में खूँटी (इअर फोन) ठोंके नीरज महाशय सड़क पर दिखाई दिए और बोले, चल आज रूद्रप्रयाग तक पहुंचना है और ऋषिकेश वाली बस में चढ़ लिए I
गंगा मैया की मूर्ति
                                 
क्रमशः ....... 

 

उत्तराखंड की ओर- भाग दो                                                                                                                                       

उत्तराखंड की ओर- भाग तीन                                                                                                                                                      

उत्तराखंड की ओर- भाग चार

 

Thursday, August 11, 2011

भक्ति और सौन्दर्य का संगम है आबू !!

 धर्मशाला (उदयपुर) में रात को केम्प फायर का आयोजन किए गया, लेकिन सब इतने थक चुके थे कि अन्त्याक्षरी के अलावा किसी भी कार्यक्रम में उत्साह नहीं दिखाई दिया ...निर्देश मिला की सुबह छः बजे सभी तैयार हो कर नाश्ते के लिए मिलेंगे।


चाय नाश्ता करने के बाद हम लोग उदयपुर से 185  किलोमीटर दूर माउंट आबू की ओर चल पड़े माउंट आबू की ओर जाते हुए मेरा मन इस तरह से उत्कंठित था,जैसे किसी प्रेमी की अपनी प्रेमिका से मिलने की तीव्र उत्कंठा हो । बस में गिर्राज मीना और दिनेश शर्मा, अशोक, महेश, विजयपाल, वीरेंदर जैसे कई साथियों ने माहौल को जीवंत बनाये रखा। नाचते गाते हम लोग आखिर पहुँच ही गए ।


    ...अपनी मंजिल के करीब "तलेटी" से बस के गियर नीचे हो गए बस के इंजन ने जोर से आवाज़ करना शुरु कर दिया । यात्रा की चढाई  जैसे जैसे ऊपर हो रही थी; लोग नीचे के दृश्य को देख कर मंत्र मुग्ध हो रहे थे । शुरू की चढाई में सूखे  हुए पहाडों  ने मेरी माउन्ट आबू के बारे में पूर्व कल्पना बोध को आघात पहुंचाया । लेकिन ज्यों ज्यों हम लोग ऊपर चढ़ रहे थे हरियाली और फूलों से लदे पेडों में इजाफा हो रहा था।

 बैरियर पे हम लोगो ने साथ लाया खाना खाया।….दिलवाड़ा  पहुँचने तक  नीचे देखने पर तो ऐसा रहा था, जैसे पूरे पहाड़ को ऊपर वाले ने कैनवास बना कर चित्रकारी कर दी हो । रक्तिम पुष्पों से लदे पहाड़ पर बीच बीच में सफ़ेद बैगनी रंग के फूल वाले वृक्षों ने सौन्दर्य में चार चाँद लगा दिए …....अद्भुत नज़ारा था।


दिलवाड़ा पहुँच कर हम लोग बस से उतरकर मंदिर की ओर चले। मंदिर में लाइन में लग क़र हम लोग अन्दर पहुंचे तो मंदिर के अन्दर का दृश्य मंत्र मुग्ध करने वाला था । इन मंदिरों के बारे में जितना सुना था उससे कही ज्यादा  सुन्दर और भव्य ये मंदिर थे!!


    
दिलवाड़ा के मंदिरों में जिन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ हैं, उन से ज्यादा श्रद्धा उन मंदिरों को बनाने वाले मजदूरों और कलाकारों के प्रति उत्पन्न होती है। जिस लगन और शिद्दत से वो मंदिर बनाये गए हैं, उसके लिए उत्कृष्ट कोटि का भक्ति भाव होना जरूरी है, सिर्फ पैसे के लिए कोई भी व्यक्ति इस दर्जे की कलाकारी नहीं कर सकता!!

दिलवाड़ा जैन मंदिर के बारे में :-



(चित्र गूगल से साभार)


  "एक इमारत,सदियों पुरानी इमारत। दुनियाभर से लोग उसे देखने आते हैं। उसके दीदार के बाद क्या होता है; उसका आप अंदाजा नहीं सकते। चौंधिया जाती है उनकी आंखें!!वो बार-बार यही सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि,आखिर अब तक कहां छिपा था,ये नायाब नमूना!!!दिल को छू जाने वाली इस इमारत को तभी तो लोग कहते हैं, "दिलवाड़ा का अजूबा!"


ये दिलवाड़ा जैन मंदिर है राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंटआबू में। तस्वीरों में आपने जो कुछ भी देखा शायद कहने की जरूरत नहीं। वाकई हस्तशिल्प का खजाना है ये मंदिर।

मंदिर का एक-एक हिस्सा ऐसा तराशा हुआ है,जैसे अभी बोल उठेगा। ऐसी खूबसूरती जिसका दीदार हर कोई करना चाहता है। कलाकृति और शिल्प का ये बेजोड़ नमूना। मंदिरकी दीवारें,खंभे सबकुछ देखकर आंखें ठहर ही जाती है। इस मंदिर का कोई भी ऐसा कोना नहीं है, जो शिल्प से नहलाया नहीं गया हो। मंदिर की एक-एक दीवारें आज अपनी कहानी बयां करती है। अपना इतिहास बताती हैं, ये दीवारें। ये वो मंदिर है, जिसका दीदार करने देश ही नहीं सात समंदर पार से भी लोग आते हैं।

सिर्फ एक नहीं बल्कि पूरे पांच मंदिरों का ये समूह हैं। सबकी अलग-अलग पहचान है। इस मंदिर से जुड़ी है कई बातें। कई कहानियां और कई मान्यताएं, जो अपने आप में अनोखी है।

माउंट आबू के आगोश में ये मंदिर आज हर किसी की आंखों का तारा बन गया है। माउंट आबू की सरजमी पर खड़ा ये मंदिर दिलवाड़ा के जैन मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां कुल पांच मंदिरों का समूह जरुर है लेकिन यहां के तीन मंदिर खास हैं। आपको बता दें दिलवाड़ा का ये मंदिर 48 खंभों पर टिका हुआ है। जी हां पूरे 48खंभे हैं इस मंदिर में। मंदिर की वास्तुकला और शिल्प को देखकर तो आपको अंदाजा लग गया होगा कि ऐसा नमूना शायद ही आपको दुनियाभर में देखने को मिले। तभी को कभी एक लेखक ने इस मंदिर को देखकर कहा था कि ताजमहल अपनी जगह होगा लेकिन ऐसी इमारत दुनिया में कहीं नहीं हो सकती।


 दिलवाड़ा के मंदिर के बारे में पढ़े जाने वाले कसीदे की इससे बड़ी मिसाल भला और क्या हो सकती है भले ही दिलवाड़ा का ये मंदिर दुनिया के सात अजूबों में शुमार नहीं है। लेकिन यहां के लिए ये मंदिर अजूबा है। लेकिन बदलते वक्त के साथ जैसे-जैसे दुनिया अपनी नंगी आंखों से इस मंदिर की बेमिसाल नक्काशी से दो चार हो रही है।

आवाज उठनी शुरू हो गई हैं कि इसे भी अजूबों की फेहरिस्त में जगह मिलनी ही चाहिए।

दिलवाड़ा जैन मंदिर कई नामचीन हस्तियों के दीदार का भी गवाह रहा है। देश के पहले प्रधानमंत्री और पहले राष्ट्रपति ने भी इसका दीदार किया था। इसके बाद इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सहित कई सियासी हस्तियों ने इस मंदिर को अपनी आंखों से देखा। जाहिर है मंदिर की अदभुत कलाकृति ने उनके दिलों पर भी गहरी छाप छोड़ी।खूबसूरती और नक्काशी के इस  बेमिसाल नमूने के दीदार के बाद तो वो इतने दीवाने हुए कि दोबारा देखने की ख्वाहिश दबा नहीं पाए। वक्त की गर्द मंदिर की चमक को जरा भी फीका नहीं कर सकी। तभी तो ये आज भी उसकी तरह खड़ा है जैसे सदियों पहले था। सफेद संगमरमर से तराशा गया ये मंदिर वाकई कमाल का है। अगर इसे दुनियाभर के सात अजूबों में शामिल करने पर आवाज उठ रही है तो गलत नहीं है।

दरअसल इस मंदिर का निर्माण गुजरात के सोलंकी राजा वीरहवज के महामंत्री वस्तुपाल और उसके भाई तेजपाल ने करवाया था। इस मंदिर की देरानी-जेठानी के गोखलों की उत्कर्ष कला दुनियाभर में प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण 11वीं और 12वीं शताब्दी में किया गया था। दिलवाड़ा का ये शानदार मंदिर जैन धर्म के तीर्थकरों को समर्पित है। यहां के पांच मंदिरों के समूह में विमल वसाही सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे 1031ईसवी में तैयार किया गया। 1231 में वस्तुपाल और तेजपाल दो भाईयों ने इसका निर्माण करवाया था। उस वक्त इस मंदिर को तैयार करने में 1500कारीगरों ने काम किया था। वो भी कोई एक या दो साल तक नहीं।पूरे 14साल बाद इस मंदिर को ये खूबसूरती देने में कामयाबी हासिल हुई थी। इस मंदिर को बनवाने में जितना वक्त लगा। उससे कहीं ज्यादा इसे बनवाने में लागत लगी। जी हां थोड़ा बहुत नहीं उस वक्त करीब 12 करोड़ 53 लाख रूपए खर्च किए गए। आप सोच सकते हैं उस वक्त के बारह करोड़ तिरेपन लाख की अभी क्या कीमत हो सकती है.।इतनी लागत औऱ सालों की मेहनत के बाद आज इसकी बेमिसाल खूबसूरती उभरकर सामने आई अगर आज की तारीख में इस मंदिर की कीमत लगाई जाए।तो शायद वो अरबों खरबों में होगी।


इस मंदिर से जुड़ी है कई परंपरा। कई ऐतिहासिक और पौराणिक परंपराओं का गवाह है दिलवाड़ा जैन मंदिर। पौराणिक कथा कहती है कि भगवान विष्णु ने बालमरसिया के रूप में अवतार लिय़ा । कहा जाता है कि भगवान विष्णु का ये अवतार गुजरात के पाटन में एक साधारण परिवार के घर में हुआ। विष्णु भगवान के जन्म के बाद ही पाटन के महाराजा उनके मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने माउंट आबू में इस मंदिर के निमार्ण की चाहत जाहिर की। ये बात पूरे राज्य में आग की तरह फैल गई। भगवान विष्णु के नये अवतार बालमरसिया ने भी महाराज के इस बात को सुना। और वो वस्तुपाल और तेजपाल के पास इस मंदिर की रुपरेखा लेकर पहुंच गए। तब वस्तुपाल ने कहा कि अगर ऐसा ही मंदिर तैयार हो गया तब वो अपनी पुत्री की शादी बालमरिसिया से कर देंगे। भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने इस प्रस्ताव को हाथों हाथ लिया। मंदिर को ऐसा बनाया की देखने वालों की आंखें चौधिया गई। पौराणिक कथा के अनुसार बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने छल कर दिया और शादी करने के लिए एक और शर्त रख दी। उन्होंने शर्त रखी कि अगर एक रात में सूरज निकलने से पहले अपने नाखूनों से खुदाई कर मैदान को झील में तब्दील कर देंगे।तब वो अपनी पोती का हाथ बालमरसिया के हाथों में देंगी। जाहिर है बालमरिया भगवान विष्णु के अवातार थे और उनके लिए ये कोई मुश्किल काम नहीं था।उन्होने एक घंटे में ही ऐसा करके दिखा दिया। फिर भी बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने अपनी पोती का विवाह उनसे नहीं किया। बाद में इस बात को लेकर भगवान विष्णु कोध्रित हो उठे और उन्होंने अपनी होने वाली दादीसास का वध कर दिया। और बाद में ये जगह कुंवारी कन्या के रुप मे मशहूर हो गई। अगर औरतें यहां आती हैं तो चूडियां चढ़ाती हैं। जबकि इस टीले पर औरतें पत्थर मारने की मान्यता है। पौराणिक कथा कहती है कि इसी जगह भगवान विष्णु ने अपनी होने वाली दादीसास का वध करके दफनाया । श्रद्धालु इस टीले पर पत्थर मारते हैं और ये जगह गवाह बनी बालमरसिया के आजीवन अविवाहित रहने की।"

{नोट:- पर्पल कलर में और इन्वर्टेड  कोमा में बंद ये लेखांश मैंने किसी ब्लॉग से लिया था किसी भाई /बहिन को पता हो तो उस ब्लॉग का पता बता दें, जिससे  मैं उस ब्लॉग के स्वामी से अनुमति लेकर धन्यवाद ज्ञापित कर सकूं और अगर उन्हें कोई आपत्ति हो तो इस लेखांश को हटा सकूं}


दिलवाडा के जैन मंदिरों की अमिट स्मृति ह्रदय में संजोये हुए हम अपनी अगली मंजिल अचल गढ़ की तरफ चल पड़े दिलवाडा के जैन मंदिरों को देख कर ऐसा लगा रहा था जैसे कोई अद्भुत स्वप्न देखा हो। बस में बैठने के बाद तंद्रा भंग हुई ….और आँखे फिर से प्रकृति का दीदार करने लगी।


अचलेश्र्वर महादेव :-
 दिलवाड़ा के मंदिरों से 8 किमी. उत्तर पूर्व में यह किला और मंदिर स्थित हैं। अचलगढ़ किला मेवाड़ के राजा राणा कुंभ ने एक पहाड़ी के ऊपर बनवाया था। पहाड़ी के तल पर 15वीं शताब्दी में बना अचलेश्वर मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव के पैरों के निशान हैं। नजदीक ही 16वीं शताब्दी में बने काशीनाथ जैन मंदिर भी हैं। इस भव्य किले में कई लैन मंदिर बने हुए है। उल्लेखनीय मंदिर है - अचलेश्र्वर महादेव मंदिर(ईसवीं सन् 1412) और शांतिनाथ जैन मंदिर(ईसवीं सन् 1513) इसमें सोने की परत चढ़ी मूर्ति है।अचलेश्र्वर महादेव मंदिरके समीप मंदिकनी कुंड व परमार धारावर्ष की एक मूर्ति स्थित है।राणा कुंभा ने इस गढ़ का निर्माण चौदहवीं शताब्दी में करवाया था।

       अचल गढ़ में भगवन भोले नाथ के दर्शन कर हमारा कारवां सफ़र के अंतिम पडाव की और चल पड़ा और शाम के वक़्त सनसेट पॉइंट से ज्यादा दर्शनीय स्थल कोई हो ही नहीं सकता।


भगवान भास्कर को अस्त होने के गवाह प्रतिदिन इतने सारे लोग होगे ऐसा मैंने सोचा भी नहीं था। जैसे कोई मेला लगा हो ऐसी भीड़ वहां थी।
(चित्र गूगल से साभार)
क्या देशी क्या विदेशी सभी उस दृश्य को आँखों के साथ कैमरों में कैद कर लेना चाहते थे और जैसे ही सूर्यास्त का वक़्त नजदीक आया सैकडों फ्लैश चमक उठे और लोगों ने ना-ना भंगिमाएं बना कर अपना चित्रण करवाया ।
(चित्र गूगल से साभार)

वहाँ से हम लोगो को साढे आठ बजे की डैड लाइन के साथ नक्की झील घूमने की स्वतंत्रता मिली।

झील में हँसो की तरह सैकडों बोट और पैडल बोट विचरण कर रही थी लोग अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से बोट में घूमने का आनंद ले रहे थे हम लोग भी छ: जने बोट ले कर “नक्की” की गोद में उतर गए यहाँ मुझे मेरी पत्नी की बहुत याद आई, क्योंकि कोई ख़ुशी अगर बांटनी हो तो उससे नजदीक मै और किसी को नहीं पाता हूँ।

  नौका विहार के बाद मै अपने साथी ओम जी के साथ भारत माता मंदिर गया जो की नक्की झील के किनारे सबको आकर्षित कर रहा था ।

   नक्की के आनंद हम इतने सरोबार हो गए की हमे साढे आठ की डैड लाइन का ध्यान ही नहीं रहा .....फलस्वरूप लौटने पर कॉलेज प्रशासकों  की क्रुद्ध नज़रों का सामना करना पड़ा । प्रिंसिपल जी की कठोर कार्यवाही की चेतावनी का मन में कोई डर नहीं लगा, क्योंकि पूरे स्टाफ का परिवार की तरह जो व्यवहार था, इसको देख कर ऐसा नहीं लग रहा था कि,  जो वो लोग कह रहे थे, उसको अमल में लायेंगे । हाँ दुःख इतना सा था कि कॉलेज प्रशासकों  को वहां कोई भी किसी भी तरह से दुखी नहीं देखना चाहता था।
   और रात दस बजे के लगभग हम लोग अपने- अपने वाहनों में सवार हो कर लौट पड़े अपने बसेरों की ओर...
                                    
मन मंजूषा में सफ़र की अविस्मरणीय यादें सहेज कर ........